Wednesday, November 16, 2011

धर्मोपदेशक, धर्म गुरू की समस्याएं

एक धर्म गुरू का कार्य वास्तव में बहुत ही मुश्किल है। सीधे ईश्वर से आज्ञा पाये बिना, कोई भी लोगों को शिक्षा या उपदेश नहीं दे सकता। लोग आपको सुनेंगे ही नहीं यदि आप ऐसे ईश्वरप्रदत्त अधिकार के बिना ही धर्मोपदेश देंगे। इन शिक्षाओं के पीछे किसी तरह का बल नहीं होगा, ये निर्बल होंगी। किसी को भी, किन्हीं आध्यात्मिक उपायों या अन्य साधनों से सबसे पहले तो ईश्वर को उपलब्ध होना होगा। तब ईश्वर अधिकृत सामथ्र्य से ही कोई उपदेश दे सकता है। ईश्वर से आज्ञा प्राप्त करने के बाद ही कोई शिक्षक हो सकता है और कहीं भी उपदेश व्याख्यान दे सकता है। वही, जो ईश्वर से इस प्रकार की आज्ञा प्राप्त करता है उसे ही ऐसी शक्तियां भी हासिल होती हैं। केवल तभी वह शिक्षक उपदेशक, मार्गदर्शक का बहुत ही कठिन कार्य निभा सकता है। कभी भी, एक आदमी के लिए, यह कैसे संभव है कि वो अन्य व्यक्ति को संसार के बंधनों से मुक्त कर सके? इस संसार का सृजनकर्ता ने माया रची है, वही एकमात्र ईश्वर, इस माया से आदमी को बचा सकता है। इसके अलावा कोई भी राहत या बचाव नहीं कर सकता सिवा उस महान सद्सत्चितआनन्द के। किसी भी आदमी के लिए यह कभी भी, कैसे संभव है कि जो ईश्वर को ही उपलब्ध ना हो या जिस पर उसकी आज्ञा की मेहर ना हो, जो ईश्वर से प्रगाढ़ दिव्य सबंधों में ना हो, वह कैसे किसी अन्य व्यक्ति को संसार के जेलखाने से आजाद करा सकता है?

रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं मैं एक दिन पंचवटी (एक उद्यान) से गुजर रहा था। वहां चीड़ के वृक्षों का झुरमुट था। वहां से मैंने एक मेंढक के चीत्कारपूर्ण टर्राने की आवाज सुनी। मुझे लगा कि उसे एक सांप ने निगल लिया है। कुछ समय बाद जब मैं उसी राह से लौटा, तब भी मैंने उसकी भयानक चीत्कार सुनी। मैंने सोचा चलो देखते हैं कि बात क्या है, और पाया कि एक पनियल सांप, पानी के सांप ने मेंढक को निगल रखा है। वह पनियल सांप ना तो उसे निगल पा रहा है और ना ही उगल पा रहा है। तो इससे ही मेंढक की भयानक तकलीफ का अंत नहीं हो पा रहा था। मैंने सोचा यदि इस मेंढक को किसी कोबरा सांप ने निगला होता तो यह ज्यादा से ज्यादा दो-चार चीखों में ही शांत हो गया होता। लेकिन यहां केवल साधारण सा पनियल सांप था, तो दोनों, सांप और मेंढक दोनों.... भयावह पीड़ा से गुजर रहे थे। ऐसे ही एक आदमी का अहंकार.... यदि उसका पाला एक सच्चे गुरू से पड़े तो दो चार चीखों जितने कष्ट में ही खत्म हो जाता है। लेकिन यदि गुरू ही कच्चा या अपरिपक्व हो तो गुरू और शिष्य दोनों ही इसी तरह की अनन्त भयानक पीड़ा से गुजरते हैं। शिष्य ना तो अपने अहंकार को छोड़ पाता है ना ही इस संसार के जंजाल से मुक्त हो पाता है। यदि शिष्य एक अक्षम... अयोग्य गुरू के चक्कर में पड़ जाये तो तो वह मुक्ति को नहीं उपलब्ध हो सकता।

आपको ईश्वर नहीं मिलता, ईश्वर आपको उपलब्ध नहीं हो सकता। आप ईश्वर को उपलब्ध होते हैं। क्योंकि समुद्र बूंद में कैसे समायेगा, बूंद को ही सागर में समाना होता है।

Tuesday, October 11, 2011

40 अस्तित्व, अनस्तित्व से जन्म लेता है।

ताओ तेह किंग 40

वापिस हो जाना ताओ की गति / प्रवृत्ति है।
उपजना ताओ का तरीका है।
दसियों हजारों चीजें ऐसे ही अस्तित्व में आती हैं।
और अस्तित्व, अनस्तित्व से जन्म लेता है।

Saturday, August 20, 2011

बुल्‍लेशाह का कलाम 2

अलफ अल्ला नाल रता दिल मेरा, मैंनु ”बे“ दी खबर ना कोई
बे पढ़दियां मैंनु समझ ना आवे, लज्जत अलफ दी आई
अैन ते गैन नु समझ ना जाणा, गल अलफ समझाई
बुल्लिया कौल अलफ दे पूरे, जिहढ़े दिल दी करन सफाई।

मेरा दिल अ अक्षर से शुरू होने वाले अल्लाह के नाम में लग गया है। मुझे अन्य अक्षरों जैसे ब, स, द की कोई खबर नहीं। मैं अन्य अक्षर पढ़ता भी हूं तो वो मेरी समझ में नहीं आते, बस ”अ“ से अल्लाह में ही लज्जत या स्वाद या आनन्द आता है। यह ”अ“ से अल्लाह ही मुझे समझाता है कि अन्य सारी वर्णमाला (या दुनियांदारी) में कुछ नहीं रखा है, इसे समझने से कोई लाभ भी नहीं। बुल्लेशाह कहते हैं ”अ“ से अल्लाह में ही सारे सद्-सत् वचन समायें हैं, जिन्हें वे लोग ही समझ सकते हैं, जो नित्य ही मन की सफाई करते रहते हैं, उसे निर्मल बनाये रखते हैं।
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उठ जाग घुराढ़े मार नहीं, इह सौण तेरी दरकार नहीं
एक रोज जहांणों जाना ऐ, जां कब्रां विच समांणा ऐ
तेरा गोश्त कीड़्यां ने खाणा ऐं, कर चेता मरग (मर्ग, मौत) विसार नहीं
उठ जाग घुराढ़े मार नहीं, इह सौण तेरी दरकार नहीं
बुल्ले शाह खुद को ही चेताते हुए कहते हैं कि -
उठो जागो घुर्राटे मार के मत सोओ, तुम्हारा इस तरह घोड़े बेचकर सोना अपेक्षित नहीं है। सबको इस जहान से एक दिन जाना है, या कब्रों में समा जाना हैं। उन कब्रों में, जिनमें कीड़ों ने इस तन को खाना है। मौत को याद रखो, उसे भूलो मत। उठो जागो, घुर्राटे मार कर मत सोओ।

तेरे साहा नेढ़े आया ए, कुझ झोली दाज रंगाइया ऐ
क्यूं आपणा आप विजाइया ए, ऐ गाफिल तैनुं सार नहीं
तेरा सगाई का मुर्हूर्त भी करीब आ गया है (यानि उम्र हो चली है मौत आने वाली है) तेरे दहेज (दाज) को रंग रोगन भी किया जा रहा है (यानि शरीर पर झुर्रिया पड़ चली हैं, सिर दाढ़ी के बाल सफेद होने लगे हैं।) फिर भी तुम अपने आपको क्यों भूले हुए हो। एक अज्ञानी की तरह क्यों तुम्हें असार और सार में अन्तर नहीं मालूम, ऐसा तुम्हारे लिए उचित नहीं है।

तूं सुत्तियां उम्र वंजाई ए, तुं चरखे तंद ना पाई ऐ
की करमों दाज तिआर नईं, उठ जाग घुराड़े मार नईं
तुमने सोते हुए ही उम्र गुजार दी है, तुमने संसार रूपी चर्खे में सदकर्मों का सूत नहीं बुना है। इस प्रकार तुम्हारा दहेज (यानि सदकर्म यानि मौत की तैयारी) तैयार नहीं है, इसलिए उठ जाओ और घुर्राटे मार कर मत सोओ।

तूं जिस दिन जौबन मत्ती सौं, तूं नाल सईंआं दे रत्ती सौं
हो गाफल गल्ली वत्ती सौं, इह भेरा तैंनु सार नहीं।
तुम जिस दिन जवान हुए उसी दिन से ही आशाओं सपनों की सहेलियों में लीन हो गये और नादानों की तरह ख्वाबों ख्यालों से बतियाते रहे इस तरह तुम्हारा दुनियांदारी में लीन होना, यह उचित नहीं है.. यह नहीं चलेगा। इसलिए जाग जाओ और घुर्राटे मार कर मत सोओ।
 
तूं मुंडे बहुत कुचंजी सौं, निरलजिआं दी निरलंजी सौं
तू खा खा खाणे रज्जी सौं, हुण ताएं तेरा बार नहीं
तुम लड़की की तरह बहुतेरे लड़कों से (यानि काम कर्म में) उलझे रहे, तुमने ऐसे ऐसे संबंध रचे कि जिनसे निर्लज्जता को भी लाज आ जाये। तुमने दिन में कई कई बार भोजन कर पेट भरा (यानि इंद्रियों को ही संतुष्ट किया) इसलिए अब तुम्हारे लिए कोई और चारा नहीं बचा है सिवाय इसके कि जाग जाओ।

अज कल तेरा मुकलावा ऐ, क्यूं सुत्ती कर कर दाअवा ऐ
अनडिठिआं नाल मिलावा ऐ, इह भलके गरम बजार नहीं
बस आज ही कल में तुम्हारी शादी होने ही वाली है (मौत आने ही वाली है) फिर भी क्यों अनजान होने का दावा कर, तुम सोये हुए हो। तुम्हारा मिलन उससे होने वाला है जिसको तुमने कभी नहीं देखा (यानि मौत से) यह दुनियांदारी का बाजार कल नहीं रहेगा इसलिए उठो जागो और घुर्राटे मारकर मत सोओ।

तूं ऐस जहानों जाएंगी, फिर कदम ना ऐथे पाएंगी
एह जोबन रूप वंजाएंगी, तै रहना विच संसार नहीं
जब तुम इस जहान से चले जाओगे, तो पलटकर कभी इसमें कदम भी ना रखोगे। यह जवानी और रूप खो दोगे, और इस संसार में नहीं रहोगो इसलिए अभी ही जाग जाओ और बेसुध होकर मत सोओ।

मंज्जल तेरी दूर दुराडी, तुं पौणा विच्चों जंगल वादी
औखा पहुंचण पैर पिआदी, दिसदी तू अवार नहीं
तेरी मंजिल बहुत दूर दूरतम है, जिसके मार्ग में कई जंगल और शहर हैं। वहां तक पैदल पहुंचना बहुत ही मुश्किल है और अध्‍यात्‍म की राह पर तुम  परिपक्व, कुशल भी नहीं दिखते, इसलिए जागो, घुर्राटे मारकर मत सोओ।

इक इकली तन्हा चलसे, जंगल बरबर दे विच रूलसे
ले ले तोशां ऐथे घलसे, उथे लैण उधर नहीं
वहां हमें एक अकेले ही जाना हैं, पर रास्ते में संसार रूपी जंगल है जहां हम धूलधूसरित हो सकते हैं यहां तो हम दूसरों की मदद से जीवन तय कर लेते हैं पर वहां किसी तरह की उधारी नहीं चलती इसलिए जागो, घुर्राटे मारकर मत सोओ।
मौत के बाद, सन्नाटे रूपी एक खाली हवेली है जहां हमें अकेले ही रहना है। वहां कोई भी यार दोस्तसाथी नहीं होता और परमात्मा का नियम इस मामले में किसी को नहीं बख्शता इसलिए जागो, घुर्राटे मारकर मत सोओ।

जिहढ़े मन देसां दे राजे, नाल जिनां दे वजदे वाजे
गये हो के बे तख्ते ताजे, कोई दुनियां दा ऐतबार नहीं
जो लोग लाखों के मन में बसते थे, राज करते थे। जिनकी शान में गायन वादन होता था। जिनकी नौबत में बाजे बजा करते थे वो सब यहां से तख्त और ताज छोड़कर चले गये तो ऐसी दुनियां का भरोसा क्या करना? इस दुनियां का कोई ऐतबार नहीं है। इसलिए जागो, घुर्राटे मारकर मत सोओ।

कित्थे है सुल्तान सिकंदर मौत ना छड्डे पीर पैगंबर
संभे छड्ड छड्ड गये अडंबर, कोई ऐथे पाइदार नहीं
विश्व का जीतने वाला सुल्तान सिकंदर कहां है? मौत तो पीरों फकीरों को भी नहीं छोड़ती। पूजापाठसाधना के नाम पर उम्र भर तरह तरह के आडंबर करने वाले सभी को मौत ले जाती है, इससे बचाने वाला कोई नहीं। इसलिए घुर्राटे मारकर मत सोओ, जागो।

कित्थे युसूफ माहि कनिआनी, लई जुलेखा फेर जवानी
कीती मौत ने उढ़क फानी, फेर उह हार सिंगार नहीं।
सोहनी महिवाल जैसे प्रेमी कहां है, जुलेखा नाम की सुंदरी की जवानी कहां है? मौत सब कुछ मिटा देती है, यह हारसिंगार नहीं रहता। इसलिए घुर्राटे मारकर मत सोओ, जागो।

कित्थे तख्त सुलेमान वाला, विच हवा उडदा सी बाला
उह भी कादर आप संभाला, कोई जिंदगी दा ऐतबार नहीं।
वह बड़े बड़े तख्तसिंहासन कहां है राज साम्राज्य कहां हैं जिसकी पताकाएं चहुं दिशांओं में ऊंची उंची लहराती थीं। यह सब परमात्मा ही संभालता है, इस जिन्दगी का तो कोई भरोसा नहीं। इसलिए घुर्राटे मारकर मत सोओ, जागो।

किथे मीर मलक मुलतानां?? सभे छड्ड छड्ड गए टिकाणा
कोई मार ना बैठे ठाणा, लश्कर दा जिनां शुमार नहीं
राजे महाराजे सब अपनो राज साम्राज्य छोड़ गये इसलिए किसी को भी अपने अमर होने के मुगालते में नहीं रहना चाहिए, मौत ना तो यह देखती है कि आप अकेले हैं ना ही यह कि आपके साथ कितना बड़ा लावलश्कर है।

फुल्लां फुल्ल चंबेली लाला, सौसन सिरबल सरू निराला
बादि खिजां कीता बुर हाला, नरगस नित खुमार नहीं
जहां चमेली के फूल खिलते हैं, जहां सावन के सिर पर रंगबिरंगे फूलों, पक्षियों,कीट पतंगों के सुन्दर मुकुट शोभा देते हैं ऐसी जगहें भी पतझड़ में बुरे हाल में होती हैं। नरगिस का खुमार बस पहर भर के लिए ही होता है। इसलिए घुर्राटे मारकर मत सोओ, जागो।

बुल्ला शह बिन कोई नाहीं, ऐथे उथे दोही जहाणी
संभल संभल के कदम टिकाईं, फेर आवण दूजी बार नहीं
उस परमात्मा के सिवा यहां या वहां दोनों जहां में कोई भी नहीं है। तुम संभल संभल कर कदम उठाना यदि इस संसार में दुबारा नहीं आना है। इसलिए घुर्राटे मारकर मत सोओ, जागो।

Friday, July 8, 2011

ब्रहमा वि‍ष्‍णु महेश का होना


अजमेरमें ब्रह्माका मन्दिर है
इसलिए अजमेरमें ख्वाजा भी हैं
निराकार ब्रह्मा मुसलमानोंके आराध्य हैं
वोभी शब्द ब्रहमाकी पूजा करते हैं
आयतोंकी पूजा
पर किताबोंमें छपा हुआ.... ब्रहमत्व थोड़ेही होताहै
शब्द का ब्रह्मा तो उसके अर्थमें है
जो अर्थ जाने, वो मुसलमान।
किताबें तो लड़ाई झगड़े दंगे फसाद कराती हैं।

पालनहार विष्णु जल के पास
जल में ही रहते हैं
यमुना नदीके पास
गहरे समन्दरमें ... द्वारकामें
गंगा के किनारे हरिद्वारमें

महाकाल सुनसानमें रहते हैं
शहर के बीचोंबीच श्मशानमें
पर्वतों हिमालयमें
जंगलोंमें
हर कहीं
जहां भी जन्म होता है
आदमी पैदा होताहै
आदमी का होना ही उसे डराता है
कि ”हुआ हुआ“, ”ना होना“ हो गया तो
इसलिए डर है... तो बाकी सब ईश्वर हैं
और शिव महेश्वर
महाईश्वर!

विनम्रता ही उत्कृष्टता का मूल है।

सारी सृष्‍टि‍ की रचना एक सृष्‍टा से हुई। धरती, आकाश और सारी प्रकृति‍ अपने आप में पूर्ण है क्‍योंकि‍ ''उनमें जो वो हैं''  ''उससे इतर कुछ होने की कामना''  का अभाव है।  हम भी सम्‍पूर्ण हो सकते हैं अगर ''हम जो हैं '' उसे ही पर्याप्‍त रूप से समझ लें। इस सम्‍पूर्णता में रहना ही नैति‍कता है, इस सम्‍पूर्णता से भटकना ही अनैति‍कता है, भ्रष्‍टता है। जब इंसान अपने संपूर्णत्‍व को जान लेता है तो ही उसे सारी मानवजाति‍ और सारी सृष्‍टि‍ के प्रत्‍येक जीव अजीव का महत्‍व भी ज्ञात होता है... उनकी सम्‍पूर्णता का भी भान होता है.. यह सहज व्‍यवहार ही वि‍नम्रता है। और वि‍नम्रता कि‍सी भी उत्‍कृष्‍टता का मूल है, आधार है।

ताओ तेह किंग 39
ये चीजों प्राचीन काल में एक ही से जन्मी। आकाश सम्पूर्ण है और साफ है। धरती सम्पूर्ण है और सुस्थिर है। आत्मा सम्पूर्ण और सबल है। घाटी सम्पूर्ण है और भरी पूरी है। दसियों हजारों चीजें सम्पूर्ण और जिन्दा हैं। राजा और देवता सम्पूर्ण हैं, और देश में खरापन है। यह सभी सम्पूर्णता की नैतिकता में हैं। आकाश की पारदर्शिता उसे गिरने से बचाती है। पृथ्वी का ठोसपन उसे खंडखंड होने से बचाता है! आत्मा की सुदृढ़ता उसे इस्तेमाल होने से बचाती है! घाटी की सम्पूर्णता उसे सूखे से बचाती हैं! दसियों हजारों चीजों की बढ़वार उन्हें मुरझाने से बचाती है। राजा का नेतृत्व और देवता देश को पतन में जाने से बचाते हैं।  इसलिए ही विनम्रता ही उत्कृष्टता का मूल है।  नियम ऊंचाईयों का आधार हैं। इनके बिना राजकुमार और देवता अपने आपको अनाथ, विधुर-विधवा, या निरर्थक विचारते हैं। क्याये लोग विनम्रता पर निर्भर नहीं हैं। बहुत ही अधिक सफलता का कोई लाभ नहीं ! धातुओं की तरह मत खड़खड़ाओ मत या पत्थरों की घंटियों की तरह खटपट मत करो।

Wednesday, July 6, 2011

महान व्यक्ति किसी भी चीज के मूल को समझता है, ना कि सतही बातों को।

ताओ तेह किंग 38
एक वाकई में भला आदमी, अपने भलेपन से बेखबर रहता है।
इसलिए तो वो भला है।
एक चालाक, सदैव भला आदमी होने की कोशिश करता है
इसलिए वो भला नहीं होता।

एक वाकई भला आदमी कुछ नहीं करता
और ऐसा कुछ भी नहीं छोड़ता जो अन-किया बचा हो।
एक मूर्ख व्यक्ति हमेशा कुछ ना कुछ करता रहता है
और हमेशा ही उसके पास कुछ ना कुछ करने को होता है।

जब वाकई एक दयालु आदमी कुछ करता है, तो वो कुछ भी अन-किया नहीं छोड़ता।
और जब एक आम आदमी कुछ करता है, तो उसके करने के लिए बहुत कुछ हमेशा बचा रहता है।
जब एक अनुशासनप्रिय कुछ करता है तो कोई प्रतिक्रिया नहीं होती,
वो किसी प्रयास को बल देने के लिए, अपनी आस्तीने नहीं चढ़ाता।

इसलिए जब ताओ खो जाता है, तो भलाई है।
जब भलाई खो जाती है तो, दयालुता है
जब दयालुता खो जाती है, तो केवल न्याय होता है
जब न्याय खो जाता है तो केवल परम्पराएं या रिवाज रह जाते हैं
परम्पराएं आस्था और ईमानदारी के भूसे के समान हैं, जो भ्रमों की शुरूआत है।
यहीं से नादानियों का आरंभ होता है।
भविष्य का ज्ञान केवल ताओ की ही सुकोमल पकड़ में रहता है।

अतःएव वाकई महान व्यक्ति किसी भी चीज के मूल को समझता है, ना कि सतही बातों को।
वह जड़ों को देखता है ना कि फूलों फलों को।
इसलिए केवल इसी को स्वीकारे बाकी सब नकार दें, निरस्त करें।

Tuesday, July 5, 2011

बिना इच्छा किये, इच्छाहीन होना, इसी तरीके से सारी चीजें शांति में रहती हैं।

ताओ तेह किंग 37
ताओ अकर्म में बना रहता है।
तथापि ऐसा कुछ भी नहीं बचा जो नहीं हुआ।
अगर राजा और मसीहा इसका अवलोकन करें
तो दसियों हजारों चीजें कुदरतन विकसित हो जायें
यदि वो फिर भी कुछ करने की इच्छा रखते हैं
तो उन्हें निराकार पदार्थ की सरलता में लौटना होगा।
बिना इच्छा किये, इच्छाहीन होना
इसी तरीके से सारी चीजें शांति में रहती हैं।

Monday, July 4, 2011

उसका किसी तरह दोहन भी नहीं किया जा सकता

ओ तेह किंग 35
वो सभी लोग उसी तक आते हैं
जो एक को ही मानते हैं
उनके लिए वह परमविश्राम, खुशी और शांति है

आते जाते लोग अच्छे संगीत और खाने के लिए रूक सकते हैं
लेकिन ताओ का विवरण
वैसे ही होता है जैसे कुछ ना हो कर होना, बेस्वाद सा होना
वो दिखता नहीं, वो सुनाई नहीं देता
और ये भी कि उसका किसी तरह दोहन भी नहीं किया जा सकता

Saturday, July 2, 2011

वो अपने मक्सद खामोशी में पूरे कर लेता है और कोई दावा नहीं करता।

ताओ तेह किंग 34
महान ताओ हवा की तरह हमारे अगल बगल बहता है, दाईं ओर भी बाईं ओर भीं।
दसियों हजारों चीजें उस पर निर्भर हैं, पर वो किसी पर आधिपत्य नहीं रखता।
वो अपने मक्सद खामोशी में पूरे पा लेता है और कोई दावा नहीं करता।

वो दसियों हजारों चीजों को पुष्ट करता है
तब भी वो उनका खुदा नहीं है
उसका कोई लक्ष्य नहीं है, वह सूक्ष्मतम है।

उसमें दसियों हजारों चीजें वापिस समा जाती हैं
तब भी वो उनका खुदा नहीं है
यह ही तो अत्यधिक महानता है

वो अपनी महानता कभी भी प्रदर्शित नहीं करता
इसलिए भी, वो वाकई महान है।

Friday, July 1, 2011

दूसरों को जानना अक्लमंदी है, खुद को जानना बुद्धत्व।

ताओ तेह किंग 33

दूसरों को जानना अक्लमंदी है।
खुद को जानना बुद्धत्व है।
दूसरों पर प्रभुत्व पाने के लिए ताकत की जरूरत पड़ती है
खुद पर प्रभुत्व पाने के लिए दृढ़ता और मजबूती की जरूरत होती है।

वो जो यह जानता है कि उसके पास काफी है, वो अमीर है।
धैर्य इच्छाशक्ति का परिचायक है।
वो जो वहां रहता है, जहां वो है, वही सदा रहता है।
वो मरता है, पर नष्ट नहीं होता, सदैव रहता है।

Tuesday, June 28, 2011

यह जानना कि कब रूका जाये, समस्याओं से बचाता है।

ताओ तेह किंग 32

ताओ हमेशा के लिए अपरिभाषित है
वह सूक्ष्मतम है, वह ऐसी अवस्था में है, जब बना ही नहीं है, अनादि है।
उसे ग्रहण नहीं किया जा सकता।
अगर कोई एक असली राजा और कोई मसीहा उसे अमल में लाते हैं
तो हजारों चीजें एकसाथ आ जाती हैं
और आनन्द की वर्षा होती है
किसी भी इंसान को किन्हीं कायदे कानूनों का पाठ पढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती
सारी चीजें स्वतः समरस (हारमोनी में)-सामंजस्यपूर्ण हो चलने लगती हैं।

जब अखण्ड को, सम्पूर्ण को बांटा जाता है, तो इन टुकड़ों को नाम की जरूरत पड़ती है।
हालांकि अभी ही काफी नाम हैं।
किसी को तो समझना जानना चाहिए कि कब रूका जाये।
यह जानना कि कब रूका जाये, समस्याओं से बचाता है।
ताओ दुनियां में वैसे ही है जैसे एक नदी अपने घर या समन्दर की ओर जा रही है।

Monday, June 27, 2011

36 जो भी कमजोर होता है सबसे पहले उसका मजबूत होना अनिवार्य है

ताओ तेह किंग 36
जो भी सिकुड़ता है
सबसे पहले उसका फैलना अनिवार्य है
जो भी कमजोर होता है
सबसे पहले उसका मजबूत होना अनिवार्य है
जो भी नीचे गिराया जाना है
सबसे पहले उसका उठना अनिवार्य है
लेने से पहले
कुछ दिया जाना भी अनिवार्यता है।

इसे चीजों की प्रकृति का अवलोकन करना कहा जाता है,
मृदु और दुर्बल, कड़े और मजबूत होने से उबरने के बाद होते हैं।

जैसे मछली गहरे पानी को नहीं छोड़ती,
ऐसे ही किसी देश के शस्त्रास्त्र का प्रदर्शन नहीं किया जाना चाहिए।

Saturday, June 25, 2011

31 किसी विजय का एक दाह संस्कार की तरह अवलोकन किया जाना चाहिए।

ताओ तेह किंग 31
अच्छे शस्त्र भय के यंत्र होते हैं, सभी जीव जंतु इनसे नफरत करते हैं।
इसलिए ताओ का अनुयायी इनका इस्तेमाल नहीं करता।
भला आदमी उल्टे वाम पक्ष को प्राथमिकता देता है
युद्धेच्छु दक्षिण हाथ को।

शस्त्रास्त्र भय के साधन हैं, यह भले आदमी के औजार नहीं।
वह उसे तभी इस्तेमाल करता है जब कोई विकल्प नहीं होता।
शांति और मौन उसके ह्दय को सदैव प्रिय होते हैं
और विजय किसी भी आनंद का कारण नहीं होती।
यदि आप विजय का जश्न मनाते हैं तो आप आपको हत्याओं में भी आनन्द मनाएंगे
और यदि आप हत्याओं में आनंद मना पाते हैं तो कभी भी अपने आप में सम्पूर्णता नहीं पा सकेंगे।

खुशियों के मौकों पर
वाम को वरीयता दी जाती है
और दुख के मौके पर
दक्षिण पक्ष को
सेना में आम सैनिक वाम पक्ष की ओर खड़ा होता है
और सेनाध्यक्ष दक्षिण पक्ष में
इसका मतलब है युद्ध एक दाहसंस्कार की तरह है
जब कई लोग मारे जाते हैं
जिनके लिए गहरे दुख भरे ह्दय से विलाप किया जाना चाहिए
यही वजह है कि किसी विजय का एक दाह संस्कार की तरह अवलोकन किया जाना चाहिए।

Friday, June 17, 2011

जगदगुरू शंकराचार्य वि‍रचि‍त ।। भवान्‍याष्‍टकम् ।।


जगदगुरू शंकराचार्य वि‍रचि‍त  ।। भवान्‍याष्‍टकम् ।।

मधुर स्‍वर में सुनें इस लि‍न्‍क पर
http://www.youtube.com/watch?v=MfjJpCpCZGo&feature=player_embedded

न तातो, न माता, न बंर्धु न दाता
ना पुत्रो, ना पुत्री, न भृत्यो ना भर्ता
ना जाया, ना विद्या ना वृत्‍ि‍र्त ममैव
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

भवाब्‍धावपारे महा दुक्ख भीरू
पपातः प्रकामी, प्रलोभी प्रमत्तः
कुःसंसार पाश: प्रबद्धः सदाहम
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

ना जानामि ज्ञानं, ना च ध्यान योगं
ना जानामि तंत्रम्, ना च स्त्रोत्र मंत्रम्
ना जानामि पूजाम्, ना च न्यास योगम्
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

ना जानामि पुण्यम्, ना जानामि तीर्थम
ना जानामि मुक्तिम, लयं वा कदाचित्
ना जानामि भक्तिम्, वृथम वापि मातः
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

कुकर्मी, कुसंगी, कुबुद्धि, कुदासा
कुलाचारा, हीना, कदाचार लीना
कुदृष्टि कुवाक्य प्रबंधः सदाहम
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

प्रजेशं, रमेशं, महेशं, सुरेशं
दिनेशं, निशीधेश्वरम् वा कदाचित
ना जानामि च अन्यं सदाहम् शरण्ये
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

विवादे, विषादे, प्रमादे, प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रु मध्ये
अरण्ये शरण्ये सदा माम प्रपाहि
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

अनाधो, दरिद्रो, जरा रोग युक्तो
महाक्षीण दीन, सदा जाड्य वक्त्रः
विपत्तौ प्रविष्टा, प्रनष्टा सदाहं
गतिस्त्वम् गतिस्त्वम् त्वं एका भवानी

Thursday, June 9, 2011

इच्‍छा क्‍या है ?


क्या ऐसा नहीं हुआ कि जब कभी आपने जीवन में पहली बार होशो हवास में कोई फल खाया, तो आपको उसके एक विशेष स्वाद की अनुभूति होती है। यह अनुभूति विशुद्ध रूप से आपकी जीभ पर स्थित रस ग्रंथियों का काम है। इससे यह भी साबित होता है कि वह सही-सही काम कर रही हैं।
लेकिन इसके बाद... आपके ध्यान में रहता कि इसके बाद क्या होता है? इसी तरह की कोई दूसरी परिस्थिति सामने आने पर पुनः जीभ उस नये फल का स्वाद आपके मस्तिष्क तक पहुंचाती है, अनुभूति कराती है....आपको अनुभूति होती है...लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।
अगर आप अपने प्रति जागरूक नहीं हैं तो बात विकृत हो सकती है। वो कैसे? आप पिछली बार हुई अनुभूति की तुलना इस अनुभूति से करते हैं। फिर इन दोनों में से एक को श्रेष्ठ और दूसरी को कमतर बताते हैं। आपके दिमाग में यह निर्णय भी तय होकर स्टोर हो जाता है कि फलां फल ही बेहतर है। यहां तक कि आप खुद से यह घोषणा भी कर देते हैं कि आइन्दा मैं वही फल खाऊंगा।
ये सब कहने का तात्पर्य यह है कि इन्द्रियों से अहसासों होना एक काम है.. अपनी प्रक्रिया है.. वो यांत्रिक हैं। आपने देखा कि आपकी जीभ के द्वारा आपके मस्तिष्क में किसी स्वाद का बोध आया। प्रीतिकर लगे तो इसे आप सुख और अप्रीतिकर लगे तो दुख कहते हैं। जबकि किसी इन्द्रिय के बोध का सुख दुख से कोई लेना देना नहीं।
पर हमारी चेतना और विवेक से उपजे विचारों से जुड़ने पर ये अहसास सुख या दुख बन जाते हैं। सुख या दुख बन जाने के बाद, इच्छाओं या अनिच्छाओं को जन्म देते हैं।
कभी दुर्घटनावश आपके शरीर में एक धारदार चीज आर पार हो जाये तो क्या होगा? यदि आपने पूर्व में इस संबंध में या इससे जुड़े विषय पर विचार पढ़े, सुने, देखे या किये हैं तो हो सकता है आप घबरायें, हो सकता है इसके लिए तैयार ही हों, हो सकता है इतनी विकट स्थिति देख ह्दयघात हो जाये.... लेकिन एक व्यक्ति जिसने इस बारे में कभी नहीं सोचा, पढ़ा, किया, उसके साथ यह वाकया हो जाये तो...। ऐसा हुआ है... कि एक व्यक्ति के शरीर में एक सरिया आर पार हो गया। वो चुपचाप डाॅक्टर के पास गया, डाॅक्टर ने हालातों के मुताबिक आवश्यक उपाय किये सरिया बाहर निकाला गया और सब ठीक ठाक हो गया।
आपने पढ़ा सुना और देखा ही होगा कि सांपों के सम्पर्क में आने पर, किसी सांप के दिख भर जाने से ही .. कई लोग भय से उपजे हार्टअटैक, ब्लड प्रेशर जैसे विकारों से ही मर जाते हैं। उसके बाद यदि सांप वाकई काट ले तो भी कई लोग, इलाज के अभाव या इलाज के दौरान ही सोच-सोच कर ही मर जाते हैं कि इतना खतरनाक वाकया हो गया... सांप ने काट लिया। ये तो किसी तरह बच गये लोगों को ही पता चल पाता है कि सांप जहरीला था या नहीं था, उसके जहर ने शरीर पर प्रभाव किया था या नहीं। ये तो सभी जानते हैं कि जहरीले सांपों का प्रतिशत बिना जहर वाले सांपों की अपेक्षा बहुत ही कम है। इस प्रकार हमारे शरीर की आवश्यकताओं अनुसार हमारी इन्द्रियों की अपनी नैसर्गिक अनुक्रियाएं हैं। लेकिन इन अनुक्रियाओं से विचारों के जुड़ने के बाद इच्छाओं, अनिच्छाओं का जन्म होता है।

अष्टावक्र गीता(मूल संस्कृत) अष्टावक्र गीता (हिंदी भावानुवाद) Ashtavakra Gita (English)



First Chapter / प्रथम अध्याय

जनक उवाच -
कथं ज्ञानमवाप्नोति, कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्य च कथं प्राप्तमेतद ब्रूहि मम प्रभो ॥१-१॥ 
वयोवृद्ध राजा जनक, बालक अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है, मुक्ति कैसे प्राप्त होती है, वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है, ये सब मुझे बताएं॥१॥
Old king Janak asks the young Ashtavakra - How knowledge is attained, how liberation is attained and how non-attachment is attained, please tell me all this.  
1 अष्टावक्र उवाच -
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात्, विषयान विषवत्त्यज ।
क्षमार्जवदयातोष, सत्यं पीयूषवद्भज ॥१-२॥ 
श्री अष्टावक्र उत्तर देते हैं -
यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये। क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये॥२॥
Sri Ashtavakra answers - If you wish to attain liberation, give up the passions (desires for sense objects) as poison. Practice forgiveness, simplicity, compassion, contentment and truth as nectar. 2  
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान् ।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥१-३॥
आप न पृथ्वी हैं, न जल, न अग्नि, न वायु अथवा आकाश ही हैं। मुक्ति के लिए इन तत्त्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए ॥३॥
You are neither earth, nor water, nor fire, nor air or space. To liberate, know the witness of all these as conscious self.
3
यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि ॥१-४॥
यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे ॥४॥
If you detach yourself from the body and rest in consciousness, you will become content, peaceful and free from bondage immediately.
4
न त्वं विप्रादिको वर्ण: नाश्रमी नाक्षगोचर: ।
असङगोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥१-५॥
आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं। आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं, ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ
You do not belong to 'Brahman' or any other caste, you do not belong to 'Brahmachari' or any other stage, nor are you anything that the eye can see. You are unattached, formless and witness of everything - so be happy. 5
धर्माधर्मौ सुखं दुखं मानसानि न ते विभो ।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा ॥१-६॥
धर्म, अधर्म, सुख, दुःख मस्तिष्क से जुड़ें हैं, सर्वव्यापक आप से नहीं। न आप करने वाले हैं और न भोगने वाले हैं, आप सदा मुक्त ही हैं
Righteousness, unrighteousness, pleasure and pain are connected with the mind not with the all-pervading you. You are neither the doer nor the reaper of the actions, so you are always almost free. 6
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा ।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥१-७॥
आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं, सदा मुक्त ही हैं, आप का बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं
You are the solitary witness of all that is, almost always free. Your only bondage is understanding the seer to be someone else.
7
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः ।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखं भव ॥१-८॥
अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मान लेते हैं। 'मैं कर्ता नहीं हूँ', इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाइये ॥८॥
Ego poisons you to believe: “I am the doer”.
Believe “I am not the doer”. Drink this nectar and be happy.
8
एको विशुद्धबोधोऽहं इति निश्चयवह्निना ।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥१-९॥
मैं एक, विशुद्ध बोध हूँ, इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें, इस प्रकार शोकरहित होकर सुखी हो जाएँ
The resolution "I am single, pure knowledge”
consumes even the dense ignorance like fire. Be beyond disappointments and be happy.
9
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत् ।
आनंदपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर ॥१-१०॥
जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे, उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें ।।१०।।

Feel the ecstasy, the supreme bliss where this world appears unreal like a snake in a rope, know this and move happily. 10
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥१-११॥
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है ।।११।।
If you think you are free you are free. If you think you are bound you are bound. It is rightly said: You become what you think. 11
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असंगो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥१-१२॥
आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक, मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छा रहित एवं शांत है। भ्रमवश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है ।।१२।।
The soul is witness, all-pervading, infinite, one, free, inert, neutral, desireless and peaceful. Only due to illusion it appears worldly. 12
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम् ॥१-१३॥
अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और 'मैं' के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें ।।१३।।
Meditate on unchanging, conscious and non-dual Self. Be free from the illusion of 'I' and think this external world as part of you. 13
 देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक ।
बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव ॥१-१४॥
 हे पुत्र! बहुत समय से आप 'मैं शरीर हूँ' इस भाव बंधन से बंधे हैं, स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ ।।१४।।
O son, you are bound thinking- “I am body” since long. Experience the Self and by this sword of knowledge cut that bondage and be happy.14
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठति ॥१-१५॥
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है।।१५।।
You are free, still, self-luminous, stainless.Trying keep yourself peaceful by meditation is your bondage. 15
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः ।
शुद्धबुद्धस्वरुपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम् ॥१-१६॥
यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है, वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है। तुम शुद्ध और ज्ञानस्वरुप हो, छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो ।।१६।। You have pervaded this entire universe; really, you have pervaded it all. You are pure knowledge, don't get disheartened. 16
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः ।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासन: ॥१-१७॥
आप इच्छारहित, विकाररहित, घन (ठोस), शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं, शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये ।।१७।।
You are desireless, changeless, solid and abode to calmness, unfathomable intelligent. Be peaceful and desire nothing but consciousness. 17
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलं ।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसंभव: ॥१-१८॥
साकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये, इस तत्‍व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है ।।१८।।
Know that form is unreal and only the formless is permanent. Once you know this, you will not take birth again. 18
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः ।
तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः ॥१-१९॥
जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी, उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी ।।१९।।
Just as form exists inside a mirror and outside it, Supreme Self exists both within and outside the body. 19
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे ।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा ॥१-२०॥ 
जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है, उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है ।।२०।।
Just as the same space exists both inside and outside a jar, the eternal, continuous God exists in all. 20            

Monday, June 6, 2011

29 साधु अति, ज्यादती से बचता है सम्तोष में रहता है।

ताओ तेह किंग 29 

क्या आप सोचते हैं कि दुनियां आपके हवाले कर दी जाये तो आप उसे सुधार देंगे?
मैं नहीं समझ सकता कि ऐसा किया जा सकता है।

ब्रह्माण्ड परमपावन है।
यदि आप इसे बदलते हैं तो आप इसका सत्यानाश कर देंगे।
यदि आप इस पर आधिपत्य करना चाहेंगे तो इसे खो देंगे।

तो चीजें कभी हमसे आगे होती हैं कभी पीछे।
कभी सांस लेना बहुत ही मुश्किल होता है, कभी आसान।
कभी सबलता होती है, कभी निर्बलता।
कभी कुछ ऊपर होता है, कभी नीचे।
इसलिए साधु अति, ज्यादती से बचता है सम्तोष में रहता है।

28 सदैव सच पर अडिग रहो ताकि अनन्त में लौट सको।

 ताओ तेह किंग 28
एक मर्द की ताकत जानो
पर एक औरत की देखभाल का ध्यान रखो।
ब्रहमांण्ड की एक धारा हो रहो
ब्रहमाण्ड की एक धारा होने के नाते
सदैव सच पर अडिग रहो
ताकि फिर से
एक छोटे बच्चे से हो सको।

सफेद को जानो
कालिमा को संभालो
दुनियां के सामने उदाहरण बनो
और दुनियां का उदाहरण होने के नाते
सदैव सच पर अडिग रहो
ताकि अनन्त में लौट सको।

आदर को जानो
तो भी विनम्रता को संभालो
ब्रह्माण्ड की घाटी हो रहो
ब्रह्माण्ड की घाटी होने के नाते
सदैव सच्चे और साधनसंपन्न रहो
ताकि अपनी अनघड़ अवस्था में लौट सको।

जब कोई लकड़ी का लड्ठा तराशा जाता है
तो वह अनुपयोगी हो जाता है
जब कोई साधु इसका इस्तेमाल करता है, वह नियंता हो सकता है,
क्‍योंकि‍ वह न्‍यूनतम काटता छांटता है। 

Saturday, June 4, 2011

46 इच्छा से बड़ा कोई पाप नहीं है

ताओ तेह किंग 46
जब ब्रह्मांड में ताओ मौजूद होता है तो
घोड़े खाद ढोते/घसीटते हैं
जब ताओ ब्रह्मांड में मौजूद नहीं होता
शहर के बाहर युद्धोन्मादी घोड़े जन्म लेते हैं

इच्छा से बड़ा कोई पाप नहीं है
असंतोष से बड़ा अभिशाप नहीं है
अपने लिए कुछ भी मांगने से बड़ा दुर्भाग्य नहीं है
इसलिए वो जो कि जानता है कि काफी ही काफी है, उसके पास हमेशा काफी रहता है।

Friday, June 3, 2011

27 उससे अभी तक कोई भी जुदा नहीं हो पाया है।

ताओ तेह किंग 27

एक अच्छी चालढाल वाला आदमी अपने पैरों के निशान नहीं छोड़ता।
एक अच्छे वक्ता की जुबान नहीं फिसलती।
एक अच्छे अनुमान लगाने वाले को गिनने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक मजबूत दरवाजे को ताले की आवश्यकता नहीं होती -
उसे अभी तक कोई नहीं खोल पाया।
अच्छे बंधन के लिए, गांठें लगाने की जरूरत नहीं होती-
क्योंकि अभी तक कोई भी उससे खुल नहीं पाया है।


इसलिए साधु सभी इंसानों का ध्यान रखता है,
किसी एक को भी नहीं छोड़ता।
वह सभी चीजों का ध्यान रखता है,
और उससे कुछ भी नहीं छूटता।
इसे ही प्रकाश का अनुसरण करना कहते हैं।

एक अच्छा आदमी कौन है?
एक बुरे आदमी का शिक्षक।
एक बुरा आदमी कौन है
जिसके आधिपत्य में भला आदमी है।
यदि शिक्षकों का आदर नहीं होगा
और शिष्यों का ध्यान नहीं रखा जायेगा
तो भ्रम पैदा होगा
चाहे कोई कितना ही बुद्धिमान हो।
यही रहस्य का मूलबिन्दु है।

26 एक स्थिर ही सारे चलायमान का आधार है


जो भारी है वह हल्के का मूल है
एक स्थिर ही सारे चलायमान का आधार है

इसलिए साधु सारा दिन सफर में रहते हैं
और अपनी गठरी पर नजर रखता है
हालांकि यहां कई सुन्दर चीजें देखने को हैं
वह सबसे (अ-जुड़ा) अममत्व में,
ओर शांत रहता है

क्यों दसियों हजारों रथों का स्वामी
जनता में लड़खड़ाता हुआ चलता है
हल्का होना, अपनी जड़ों से उखड़ना है
अशांत होना, अपने पर ही नियंत्रण खोना है

Thursday, June 2, 2011

अच्छे वर्षों को युद्ध के लिए ना बितायें

ताओ तेह किंग 30
अगर आप ताओ के तरीके से किसी शासक को सुझाव दें
तो यह सलाह दें ब्रह्माण्ड को जीतने हेतु ताकत का इस्तेमाल ना करें।
यह केवल प्रतिरोध का कारण होगा।
जहां से भी सैनिकों के बूट गुजरते हैं, कंटीली झाडि़यां उग आती हैं।

अच्छे वर्षों को युद्ध के लिए ना बितायें
बस वही करें जिसकी आवश्यकता है
शक्ति का अन्यथा लाभ ना उठायें।

उपलब्धियां हासिल करें
पर उनकी महिमा ना गाने लगें।
उपलब्धियां हासिल करें
लेकिन शेखी ना बघारें
उपलब्धियां हासिल करें
लेकिन अभिमान ना करें
उपलब्धियां हासिल करें
क्योंकि यह प्राकृतिक तरीका है
उपलब्धियां हासिल करें
लेकिन हिंसा के द्वारा नहीं।

बलप्रयोग के पीछे पीछे ही शक्ति का पतन चला आता है,
यह ताओ का तरीका नहीं है
जो भी ताओ के विपरीत जाता है
जल्द ही परिणिति को पहुंचता है।

25 सदैव अभी यहीं, और गतिमान


कुछ रहस्यात्मक तरीकों से गढ़ा गया है
स्वर्ग और पृथ्वी से पहले जन्मा है
चुप्पी और शून्य में
अपने आप में अकेला खड़ा है, बिना बदले अपरिवर्तनीय
सदैव अभी यहीं, और गतिमान
जो संसार की करोड़ों चीजों की जननी है
मैं उसका नाम नहीं जानता
उसे ताओ कहता हूं
और बेहतर शब्द की कमी के कारण
महान !

वो महान, बहता है
वो बहुत दूर बहता है
चला ही जाता है और
लौट आता है

इसलिए ताओ महान है
स्वर्ग महान है
धरती महान है
राजा महान है
यह ब्रहमाण्ड की चार महान शक्तियां हैं
और राजा इनमें से ही एक है

इंसान धरती का अनुसरण करता है
धरती स्वर्ग का अनुसरण करती है
स्वर्ग ताओ का अनुसरण करता है
ताओ अपनी ही प्रकृति‍ का अनुसरण करता है

Wednesday, February 9, 2011

जिस प्रार्थना में मांग है, क्या वह प्रार्थना है?


कुदरतन जो पैदल चलता है, वो ईश्वर से साईकिल मांगता है? अब पैदल चलने वाला ईश्वर से फरारी की मांग कर सके इसके लिए उसका बहुत ही ईमानदार होना बहुत जरूरी है। ईमान यानि धर्म। यानि धार्मिक होना बहुत जरूरी है। तो क्या छोटी-छोटी इच्छाओं वाले धार्मिक नहीं होते? ये तो निहायत ही जायज लगता है कि पैदल चलने वाला भगवान से साईकिल मांगे, लेकिन अपनी मांग को अपना अधिकार मानने का जायजपना रखना ही किसी धार्मिक की भ्रष्टता है। मांगने में कैसा अधिकार? इसलिए कहा कि वही सरल ह्दय पैदल चलने वाला, सच्चा धार्मिक ही ईश्वर से फरारी या चन्द्रमा तक जाने वाले स्कूटर की मांग कर सकता है।
इच्छा रखना मात्र ही भ्रष्टता है। अब पैदल चलने वाला साईकिल की मांग करता है, साईकिल मिल जाने पर मोटरसाईकिल की मांग रखता है, मोटरसाईकिल मिल जाने पर कार और कार मिल जाने पर हवाई जहाज। आम लोग इस चक्र को ही जिन्दगी में तरक्की करना कहते हैं। लेकिन क्या यह भ्रष्टाचार का कुचक्र नहीं। पैदल चलने वाला थक जाता है, समय लगता है इसलिए साईकिल की मांग करता है। साईकिल शरीर से ही चलती है, उससे प्रदूषण नहीं होता। मोटरसाईकिल पाते ही वह साईकिल को भूल जाता है और यह भी कि मोटरसाईकिल धुंआ छोड़ती है, प्रदूषण फैलाती है। पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं मानसिक प्रदूषण भी। मोटरसाईकिल मालिक, साईकिल चलाने वाले को हिकारत की दृष्टि से देखने लगता है, कार वाला मोटरसाईकिल वाले को। इस भ्रष्ट कुचक्र का कोई अंत नहीं है, तो जब भी कोई ‘‘इच्छा’’ खड़ी हो  या प्रार्थना में मांग आये, सोचें कि यह किस कुचक्र में ले जायेगी।