मित भाषण श्रेयस्कर है।
प्रकृति भी मितभाषी होती है।
देर रात गये आया तूफान बहुत देर तक नहीं ठहरता।
लगातार कई दिनों तक बारिश हो, ऐसा भी कम ही होता है।
यहाँ तक कि प्रकृति भी एक ही रूप में बहुत देर तक नहीं रहती।
जमीन और आसमान भी एक जैसे नहीं रहते।
तो आदमी के अस्तित्व की क्या कहें?
जो परमात्मा का अनुसरण करता है परमात्मा से ही ऐक्य प्राप्त कर लेता है।
जो पुण्य करता है, पुण्यों को प्राप्त होता है।
जो मार्ग से भटक जाता है, वह नष्ट हो जाता है।
जो परमात्मा का साह्चर्य करता है परमात्मा उसका स्वागत करता है।
जो पुण्यों के साथ साहचर्य करते हैं वह पुण्य भोगते हैं।
जो मार्ग भटकता है वह अपनी इच्छा से भटकने का आनंद भोगता है।
जो किसी पर विश्वास नहीं करता, लोग भी उस पर विश्वास नहीं करते।
जो किसी पर विश्वास नहीं करता, उसका विश्वास कैसे किया जा सकता है?
Monday, October 26, 2009
Friday, October 23, 2009
22 मृतप्राय या न होने जैसा हो जाने में ही परम संरक्षण है।
22
बीज में ही वृक्ष छुपा रहता है।
जो पैदा होता है, नष्ट होता है वो फिर पैदा होता है अर्थात् मृत्यु में संरक्षण है।
जो मुड़ा हुआ है, वही सीधा हो सकता है।
जो खाली है, वही भर सकता है।
जो पुराना होता और घिसता है, वही नया हो सकता है।
जितने कम की उम्मीद रखेंगे, उतना ही अधिक मिलेगा।
जितना अधिक पाने की कोशिश करंेगे उतना ही भ्रम में पड़ेंगे।
इसलिए भला आदमी एक ही को अपनाता है और दूजों के लिए उदाहरण बनता है।
वह प्रदर्शन नहीं करता, सामने नहीं आता, इसलिए चैगुना प्रसिद्ध होता है।
अपने आपको सिद्ध करने की कोशिश नहीं करता, इसलिए सभी उसे उत्कृष्ट कहते हैं।
अभिमान नहीं करता, इसलिए सभी जगह मान्य होता है।
डींगंे नहीं मारता, इसलिए उसे नीचा नहीं देखना पड़ता।
वह किसी से लड़ता झगड़ता नहीं, इसलिए उससे भी कोई नहीं लड़ता-झगड़ता।
इसलिए प्राचीन लोग कहते थे:
मृतप्राय या न होने जैसा हो जाने में ही परम संरक्षण है।
तब वह पूर्ण हो जाता है और सब कुछ उसी में समाहित रहता है।
बीज में ही वृक्ष छुपा रहता है।
जो पैदा होता है, नष्ट होता है वो फिर पैदा होता है अर्थात् मृत्यु में संरक्षण है।
जो मुड़ा हुआ है, वही सीधा हो सकता है।
जो खाली है, वही भर सकता है।
जो पुराना होता और घिसता है, वही नया हो सकता है।
जितने कम की उम्मीद रखेंगे, उतना ही अधिक मिलेगा।
जितना अधिक पाने की कोशिश करंेगे उतना ही भ्रम में पड़ेंगे।
इसलिए भला आदमी एक ही को अपनाता है और दूजों के लिए उदाहरण बनता है।
वह प्रदर्शन नहीं करता, सामने नहीं आता, इसलिए चैगुना प्रसिद्ध होता है।
अपने आपको सिद्ध करने की कोशिश नहीं करता, इसलिए सभी उसे उत्कृष्ट कहते हैं।
अभिमान नहीं करता, इसलिए सभी जगह मान्य होता है।
डींगंे नहीं मारता, इसलिए उसे नीचा नहीं देखना पड़ता।
वह किसी से लड़ता झगड़ता नहीं, इसलिए उससे भी कोई नहीं लड़ता-झगड़ता।
इसलिए प्राचीन लोग कहते थे:
मृतप्राय या न होने जैसा हो जाने में ही परम संरक्षण है।
तब वह पूर्ण हो जाता है और सब कुछ उसी में समाहित रहता है।
Thursday, October 22, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 21
परमात्मा का अनुसरण करना महान धर्म और नैतिकता है।
अगम्य और अमूर्त है और फिर भी उसके अनन्त रूपाकार हैं।
आदिकाल से अब तक उसका नाम कोई नहीं भुला पाया।
यह सब जानने के कारण, क्योंकि मैं उसे जानता हूं इसलिए मैं सृजन के मार्ग जानता हूं।
वही अगम्य अमूर्त है।अगम्य और अमूर्त है और फिर भी उसकी अनन्त छवियां हैं।
अगम्य और अमूर्त है और फिर भी उसके अनन्त रूपाकार हैं।
वह धुंधला और काला है और वही सारों का सार है।वह परम सारवान है और अति यथार्थ है इसलिए उसमें श्रद्धा जैसा कुछ रखना झूठ है।
आदिकाल से अब तक उसका नाम कोई नहीं भुला पाया।
यह सब जानने के कारण, क्योंकि मैं उसे जानता हूं इसलिए मैं सृजन के मार्ग जानता हूं।
Wednesday, October 21, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 20
- सीखना और बनावटीपन छोड़ दो और अपनी सभी समस्याओं का अंत करो।
- क्या साधु और शैतान में कोई अन्तर है?
- जिससे दूसरे लोग डर रहें हैं, अवश्य ही उससे मुझे भी डरना चाहिए? यह क्या मूर्खता है?
- अन्य सभी लोग यज्ञ में बैल की बलि के मांस से संतुष्ट हैं। बसंत ऋतु में कुछ लोग उद्यानों में और कुछ छतों पर बैठे आनंदमग्न हैं।
- ऐसे नवजात शिशु सा जिसने अभी मुस्कुराना भी नहीं सीखा, मैं ही प्रवाहित नदी में तिनके सा, यह भी नहीं जानता कि स्वयं मैं कहां हूँ? मैं अकेला हूँ, बिना इस बात के ज्ञान के कि मुझे कहीं जाना भी है या मुझे ही कहीं नहीं जाना है।
- लोगों के पास उनकी जरूरत से ज्यादा है और मेरे पास ही कुछ भी नहीं है।
- मैं मूर्ख हूं, भ्रम में हूं बाकी सब स्पष्ट और चमकदार हैं, बस मैं ही धुंधला, मंदा और दुर्बल हूँ।
- लोग तीखे और चालाक हैं, मैं ही भोला और झल्ला हूँ।
- ओह! मैं ही समुद्र की लहर सा दिशाहीन, और अविश्रांत वायु सा बहता हूं।
- लोग महत्वपूर्ण कामों में व्यस्त हैं, बस मैं उद्देश्यहीन और उदास हूं।
- मैं सर्वथा अलग हूं क्योंकि मैं ही धरती माँ द्वारा पोषित हूँ।
Tuesday, October 20, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 19
- यह सभी अपने आप में बाह्यरूपाकार मात्र हैं, और अपने आप में सम्पूर्ण नहीं:
- झूठी दयालुता और नैतिकता त्याग दो, लोग अपने में ही धर्मनिष्ठता और प्रेम पुनः खोज लेंगे।
- चतुराई त्याग दो, लाभ छोड् दो चोर और डाकू अपने आप खत्म हो जायेंगे।
- यह और महत्वपूर्ण है:
- किसी की यथार्थ प्रकृति को समझ पाना।
- स्वार्थपरता और ज्वलंत इच्छाओं को अपने से अलग-थलग कर पाना।
Friday, October 16, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 18
- जब परमात्मा को भूला दिया जाता है, तब दिखावटी दयालुता और नैतिकता प्रकट करने का फैशन आ जाता है।
- जब पांडित्य और छद्म अक्लमंदी पैदा होते हैं तब महान पाखंड शुरू होते हैं।
- जब अपने घर में शांति नहीं मिलती तब झूठी भक्ति और धार्मिकता का आचरण प्रारंभ किया जाता है।
- जब देश भ्रम और अराजकता में हो तब ईमानदार अधिकारियों का प्रादुर्भाव होता है।
इन सब का तात्पर्य क्या यह नहीं कि असली सिक्कों की कमी होने पर खोटे सिक्के चलन में आ जाते हैं।
- जब पांडित्य और छद्म अक्लमंदी पैदा होते हैं तब महान पाखंड शुरू होते हैं।
- जब अपने घर में शांति नहीं मिलती तब झूठी भक्ति और धार्मिकता का आचरण प्रारंभ किया जाता है।
- जब देश भ्रम और अराजकता में हो तब ईमानदार अधिकारियों का प्रादुर्भाव होता है।
इन सब का तात्पर्य क्या यह नहीं कि असली सिक्कों की कमी होने पर खोटे सिक्के चलन में आ जाते हैं।
Tuesday, October 13, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 17
- जो जरा सा भी मुश्किल होता है उसे कम ही लोग जानते हैं। उनसे भी कम लोग उसे अमल में लाते हैं। और उनसे भी कम लोग विवेक के मार्ग पर बने रहते हैं।
- डरे और भीरू लोग जिन्हें खुद पर ही विश्वास नहीं उन पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?
- जब बिना कुछ कहे सुने काम हो जाता है तो लोग लोग अहं से भरकर कहते हैं ”हमने कर दिखाया।“
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