इसलिये जो हो रहा है
उसे
केवल देखें,
उसमें बाधाएं पैदा ना करें।
ना ही रोयें गायें
ना ही इतरायें इठलायें
ना ही जोड़े घटायें।
क्योंकि
जब भी तुमने कुछ किया
जब भी तुम कर्ता बने
दूसरा सिरा भी साथ्ा ही चलने लगता है
भला करने चलोगे, तो बुरा भी होगा।
तो अपने बस में यही है
कि देखें
क्योंकि देखने से ही असली चीज होती है
जो तुमसे होनी चाहिये
और उस होने में
कोई बाधा नहीं बन सकता
तुम्हारी दुनियां का
कोई ईश्वर भी नहीं।
Tuesday, March 2, 2010
Saturday, January 30, 2010
एकरसता
अगर मैं बैठा रहता हूं
या लेटा रहता हूं
तो यह बैठना और लेटना
एकरसता बोरियत लाती है।
मैं चलना शुरू करता हूं
तो पहले पहल
मजा आता है
और दूरियां नापने में ही
सार्थकता समझ आती है।
फिर थकानों से मिलने,
नये नये दृश्य देखने का शगल भी
एकरसता हो जाता है।
मैं चाहता हूं
मैं ठहरूं भी
मैं पुराने ही दृश्य
फिर एक बार देखूं
मैं चाहता हूं
फिर बैठा रहूं
या लेटा रहूं।
फुर्सत के दिनों की तरह।
सारी हवस
पहले-पहल
जरूरतों की शक्ल में ही आती है,
फिर आदत बन जाती है
जरूरतों की राह चलते-चलते,
हवस के जंगल में भटक जाता है आदमी
तो किसी भी चीज को
‘जरूरत की मान्यता’ देने के पहले
आदमी को
दो लाख बार सोचना चाहिये।
छोटी-छोटी देहों में ही, ये सारे ब्रम्हांड बढ़े हैं
अंकुर की नींदों में देखो, कितने सारे वृक्ष खड़े हैं
या लेटा रहता हूं
तो यह बैठना और लेटना
एकरसता बोरियत लाती है।
मैं चलना शुरू करता हूं
तो पहले पहल
मजा आता है
और दूरियां नापने में ही
सार्थकता समझ आती है।
फिर थकानों से मिलने,
नये नये दृश्य देखने का शगल भी
एकरसता हो जाता है।
मैं चाहता हूं
मैं ठहरूं भी
मैं पुराने ही दृश्य
फिर एक बार देखूं
मैं चाहता हूं
फिर बैठा रहूं
या लेटा रहूं।
फुर्सत के दिनों की तरह।
सारी हवस
पहले-पहल
जरूरतों की शक्ल में ही आती है,
फिर आदत बन जाती है
जरूरतों की राह चलते-चलते,
हवस के जंगल में भटक जाता है आदमी
तो किसी भी चीज को
‘जरूरत की मान्यता’ देने के पहले
आदमी को
दो लाख बार सोचना चाहिये।
छोटी-छोटी देहों में ही, ये सारे ब्रम्हांड बढ़े हैं
अंकुर की नींदों में देखो, कितने सारे वृक्ष खड़े हैं
Monday, December 14, 2009
तेरा खेल
कोई वजह नहीं है कि तुझे याद किया जाये
और तुझे कोई याद कर भी नहीं रहा है
और तुझे फर्क भी नहीं पड़ता
कि कोई तुझे याद करे ना करे
बस हम जैसे इंसान
दिखावटी अध्यात्म और धर्म के नाम पर
मन के धोखों में
या अपनी निराशाओं के झोंकों में
तुझे याद करते हैं
किसी रोगी की तरह
जिसके मुंह से निकलने वाली
दर्द और बेबसी की आवाजें
उसकी अपनी मर्जी नहीं होतीं
बच्चों और
उसके जैसे अन्य रोगियों के सिवा
उसके पास मंडराते
और चालू, चलते फिरते लोग
उस पर तेरे डर की वजह से
हंसते भी नहीं है
सब मग्न हैं उस खेल में
जिसे बस तू ही खेल की तरह खेलता है
बाकी सब बड़ी गंभीरतापूर्वक अपनी पारियां
टाईमपास कर बिता रहे हैं
बोझ सा लगता है जिन्दगी का खेल
आठ दस घंटें की नौकरी या धंधा पानी
और संडे के संडे सोचना
कि ये सांसों की कहानी
फ्लॉप फिल्म सी
किसी गांव के सिनमा घर में
टाईमपास के लिए इकट्ठे गंवारों में भी
सुनी देखी नहीं जायेगी
हालांकि किसी की जिन्दगी
किसी के लिए फिल्म हो
ये कोई भी नहीं चाहता
फिर भी सबके लिए, सबकी जिन्दगी
एक फिल्मी सीन की तरह है
और तुझे कोई याद कर भी नहीं रहा है
और तुझे फर्क भी नहीं पड़ता
कि कोई तुझे याद करे ना करे
बस हम जैसे इंसान
दिखावटी अध्यात्म और धर्म के नाम पर
मन के धोखों में
या अपनी निराशाओं के झोंकों में
तुझे याद करते हैं
किसी रोगी की तरह
जिसके मुंह से निकलने वाली
दर्द और बेबसी की आवाजें
उसकी अपनी मर्जी नहीं होतीं
बच्चों और
उसके जैसे अन्य रोगियों के सिवा
उसके पास मंडराते
और चालू, चलते फिरते लोग
उस पर तेरे डर की वजह से
हंसते भी नहीं है
सब मग्न हैं उस खेल में
जिसे बस तू ही खेल की तरह खेलता है
बाकी सब बड़ी गंभीरतापूर्वक अपनी पारियां
टाईमपास कर बिता रहे हैं
बोझ सा लगता है जिन्दगी का खेल
आठ दस घंटें की नौकरी या धंधा पानी
और संडे के संडे सोचना
कि ये सांसों की कहानी
फ्लॉप फिल्म सी
किसी गांव के सिनमा घर में
टाईमपास के लिए इकट्ठे गंवारों में भी
सुनी देखी नहीं जायेगी
हालांकि किसी की जिन्दगी
किसी के लिए फिल्म हो
ये कोई भी नहीं चाहता
फिर भी सबके लिए, सबकी जिन्दगी
एक फिल्मी सीन की तरह है
Saturday, December 5, 2009
तू ही रचैया है
उम्मीद के साहिल छूट गये, भंवरों के आगोश में नैया है
तूफां में उलझी कश्तियों का, सदा तू ही रहा खेवैया है
मेरा होना, ना होना क्या, सब तेरी मर्जी तेरी रजा
ये सजा बने या मजा बने, इस बात का तू ही रचैया है
तन मन धन के रिश्ते नाते, सब अर्थी तक ही हैं जाते
तुझसे जो रिश्ता वही असली, बाकी सब धूप है छैंयां है
इच्छाओं वेश्याओं संग, जो रमा रचा वो कहां बचा
तेरी बंसी सुनकर जो जी लीं, उन गोपियों का तू कन्हैया है
Monday, November 9, 2009
रे मन भजो प्रभु का नाम!
रे मन भजो प्रभु का नाम!
जब तक सांस में सांस रहेगी, जग से झूठी आस रहेगी।
कहेगी जुबां दिल के अफसाने, कोई सुने, चाहे माने न माने।
विराने जब रिश्तों पे उतरें, और उम्रें ख्वाबों के पर कुतरें।
वरें अंधेरे जब सन्नाटे, कदम-कदम हो मृत्यु की आहटें।
सुगबुगाहटें हों जब परलोक की, खबर नहीं हो जब उस ओट की।
खोट देखकर जग की रोंएं जब नैना अविराम,
रे मन भजो प्रभु का नाम।
जब तक सांस में सांस रहेगी, जग से झूठी आस रहेगी।
कहेगी जुबां दिल के अफसाने, कोई सुने, चाहे माने न माने।
विराने जब रिश्तों पे उतरें, और उम्रें ख्वाबों के पर कुतरें।
वरें अंधेरे जब सन्नाटे, कदम-कदम हो मृत्यु की आहटें।
सुगबुगाहटें हों जब परलोक की, खबर नहीं हो जब उस ओट की।
खोट देखकर जग की रोंएं जब नैना अविराम,
रे मन भजो प्रभु का नाम।
Thursday, November 5, 2009
हकीकत
हमारे आसपास सड़कों और गलियों में मिलने वाले लोगों में से एक बहुत बड़ा प्रतिशत लोग अन्दर से खोखले, खाली हैं, वास्तव में वो मर ही चुके हैं। यह हमारा सौभाग्य है कि हम उनको देखते नहीं और न उनको जानते हैं। अगर हम यह जान जाएं कि कितनी संख्या में हमारे आसपास ही ऐसे लोग हैं जो मरे हुए हैं और हमारे जीवन पर शासन कर रहे हैं तो हम डर के मारे पागल हो जायेंगे।
- जार्ज इवानोविच गुरजियेफ
Wednesday, November 4, 2009
जलालुददीन रूमी
जलालुद्दीन रूमी का जन्म 1207 में अफगानिस्तान के बल्ख प्रांत में हुआ। उनके पिता स्थानीय तौर पर महत्वपूर्ण अध्येता एवं शिक्षक थे। 1212 के लगभग वह सपरिवार समरकंद चले आये जो उन दिनों तुर्की और पर्शिया की संस्कृतियों का संगम स्थल था।
मुस्लिम देशों के अधिकांश भाग पर मंगोलों के हमलों से मृत्यु और ध्वंस का वातावरण था सो रूमी का परिवार इनसे बचता बचाता पश्मोत्त्तर की ओर चला गया।
इस प्रकार उनका परिवार कोन्या (तुर्की) पहुंचा जहां रूमी के पिता को प्रोफेसरशिप मिल गयी जो उनकी मृत्यु 1231 तक जारी रही। पिता की मृत्यु के बाद विश्वविद्यालय में वही प्रोफेसर का पद रूमी को मिल गया।
1244 में रूमी की मुलाकात एक मुहम्मद को चाहने वाले तबरीज के पुत्र खानाबदोश सूफी शमसुद्दीन से हुई। इसके बाद तो वे अभिन्न मित्र रहे। मुलाकात के बाद रूमी के अन्दर का प्रोफेसर तो कम हुआ पर आध्यात्मिक उन्नति होने लगी।
रूमी के छात्र रूमी और शम्स की मित्रता से ईष्र्या करने लगे जिसकी वजह से शम्स को लुप्त होना पड़ा।
शम्स के खो जाने के 40 दिनों बाद , रूमी ने शोकवस्त्र पहन लिये। वे पूरी तरह बदल गये। उनके मुंह से ऐसा काव्य निःसृत होने लगा जो अपूर्व था। वे सूफियों की तरह निंरंतर घूमते हुए नृत्यरत रहते और अभीप्सा और प्रेम के गीत गाते थे, यह सब उनकी अचंभित करने वाली रूपांतरित अवस्था का परिचायक था।
उनका आध्यात्मिक संदेश देशकाल की परिधि से परे था, वे कहते थे - मैं ना तो पूर्व का हूं न पश्चिम का मेरे ह्रदय में किसी तरह की सीमाएं नहीं हैं।
मेरा स्थान, स्थानरहितता है
मेरे चिन्ह, चिन्हरहितता है
न देह, न आत्मा से मेरा संबंध है
अपने प्रिय के प्रेम में
मैंने द्वैत का चोला उतार फेंका है
मेरे देखे दोनों शब्द एक हैं
मैं एक को ही ढूंढता हूं,
केवल एक को ही जानता हूं
केवल एक को ही देखता हूं
केवल एक को ही पुकारता हूं
वही प्रथम है वही अंतिम है
वही बाहर है वह अन्तःपुर में है
मैं प्रेम के प्याले में डूबा हुआ हूं
-----------
मानव का यह शरीर
एक सराय की तरह है
जहां रोज
कोई नया आगंतुक आता है
कुछ आनन्द सा, कुछ अवसाद सा, कुछ कमतर-सा
कभी क्षणिक चेतना भी आती है
उस अतिथि की तरह
जिसके आने की आशा न हो।
पर सबका स्वागत करो, पूछ परख लो -
चाहे वो दुखों की भीड़ हो,
जो स्वेच्छा से आपके घर के
सजावटी सामानों तक को बाहर फेंक
पूरी तरह साफ कर देती है।
पर उससे सम्मानपूर्ण व्यवहार करो।
वो आपको पूरी तरह धोकर
एक नये आनन्द से भर देगी
कुविचारो, शर्म ओर द्वेष से भी
द्वार पर ही हँसते हुए मिलो
और जो भी आये
सभी को अनुग्रहपूर्वक
आमंत्रित करो
क्योंकि प्रत्येक
किसी पथ प्रदर्शक की तरह
भेजा गया है
पीछे से।
1272 में रूमी का देहावसान हो गया। उनकी पुण्यतिथि को सुहागरात की तरह मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन उनका अपने प्रिय से मिलन हुआ।
उनकी काव्य और कहानियां प्रियतम से बिछड़ने और मिलने की गाथा हैं। दिवान-ए शम्स-ए-तबरीज, फिही मा फिही, द मकतब और मजलिस-ए-सबाह उनके रचना संकलन हैं।
अधिक जानकारी के लिए देखें
http://www.rumi.org.uk/
http://www.rumionfire.com/
मुस्लिम देशों के अधिकांश भाग पर मंगोलों के हमलों से मृत्यु और ध्वंस का वातावरण था सो रूमी का परिवार इनसे बचता बचाता पश्मोत्त्तर की ओर चला गया।
इस प्रकार उनका परिवार कोन्या (तुर्की) पहुंचा जहां रूमी के पिता को प्रोफेसरशिप मिल गयी जो उनकी मृत्यु 1231 तक जारी रही। पिता की मृत्यु के बाद विश्वविद्यालय में वही प्रोफेसर का पद रूमी को मिल गया।
1244 में रूमी की मुलाकात एक मुहम्मद को चाहने वाले तबरीज के पुत्र खानाबदोश सूफी शमसुद्दीन से हुई। इसके बाद तो वे अभिन्न मित्र रहे। मुलाकात के बाद रूमी के अन्दर का प्रोफेसर तो कम हुआ पर आध्यात्मिक उन्नति होने लगी।
रूमी के छात्र रूमी और शम्स की मित्रता से ईष्र्या करने लगे जिसकी वजह से शम्स को लुप्त होना पड़ा।
शम्स के खो जाने के 40 दिनों बाद , रूमी ने शोकवस्त्र पहन लिये। वे पूरी तरह बदल गये। उनके मुंह से ऐसा काव्य निःसृत होने लगा जो अपूर्व था। वे सूफियों की तरह निंरंतर घूमते हुए नृत्यरत रहते और अभीप्सा और प्रेम के गीत गाते थे, यह सब उनकी अचंभित करने वाली रूपांतरित अवस्था का परिचायक था।
उनका आध्यात्मिक संदेश देशकाल की परिधि से परे था, वे कहते थे - मैं ना तो पूर्व का हूं न पश्चिम का मेरे ह्रदय में किसी तरह की सीमाएं नहीं हैं।
मेरा स्थान, स्थानरहितता है
मेरे चिन्ह, चिन्हरहितता है
न देह, न आत्मा से मेरा संबंध है
अपने प्रिय के प्रेम में
मैंने द्वैत का चोला उतार फेंका है
मेरे देखे दोनों शब्द एक हैं
मैं एक को ही ढूंढता हूं,
केवल एक को ही जानता हूं
केवल एक को ही देखता हूं
केवल एक को ही पुकारता हूं
वही प्रथम है वही अंतिम है
वही बाहर है वह अन्तःपुर में है
मैं प्रेम के प्याले में डूबा हुआ हूं
-----------
मानव का यह शरीर
एक सराय की तरह है
जहां रोज
कोई नया आगंतुक आता है
कुछ आनन्द सा, कुछ अवसाद सा, कुछ कमतर-सा
कभी क्षणिक चेतना भी आती है
उस अतिथि की तरह
जिसके आने की आशा न हो।
पर सबका स्वागत करो, पूछ परख लो -
चाहे वो दुखों की भीड़ हो,
जो स्वेच्छा से आपके घर के
सजावटी सामानों तक को बाहर फेंक
पूरी तरह साफ कर देती है।
पर उससे सम्मानपूर्ण व्यवहार करो।
वो आपको पूरी तरह धोकर
एक नये आनन्द से भर देगी
कुविचारो, शर्म ओर द्वेष से भी
द्वार पर ही हँसते हुए मिलो
और जो भी आये
सभी को अनुग्रहपूर्वक
आमंत्रित करो
क्योंकि प्रत्येक
किसी पथ प्रदर्शक की तरह
भेजा गया है
पीछे से।
1272 में रूमी का देहावसान हो गया। उनकी पुण्यतिथि को सुहागरात की तरह मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन उनका अपने प्रिय से मिलन हुआ।
उनकी काव्य और कहानियां प्रियतम से बिछड़ने और मिलने की गाथा हैं। दिवान-ए शम्स-ए-तबरीज, फिही मा फिही, द मकतब और मजलिस-ए-सबाह उनके रचना संकलन हैं।
अधिक जानकारी के लिए देखें
http://www.rumi.org.uk/
http://www.rumionfire.com/
अगर तुम खुद को
केवल, पल भर के लिए भी
जान लेते हो
अगर तुम्हें
अपने बहुत ही खूबसूरत चेहरे की
झलक भर मिल गई है
तो इस मिट्टी के घर में
शायद,
तुम इतनी गहरी नींद में नहीं सो पाओगे।
अपने आनन्द गृह में क्यों नहीं चले जाते
जिसके हर रंध्र से,
केवल, पल भर के लिए भी
जान लेते हो
अगर तुम्हें
अपने बहुत ही खूबसूरत चेहरे की
झलक भर मिल गई है
तो इस मिट्टी के घर में
शायद,
तुम इतनी गहरी नींद में नहीं सो पाओगे।
अपने आनन्द गृह में क्यों नहीं चले जाते
जिसके हर रंध्र से,
तुम्हारा ही प्रकाश
बाहर को फूटता सा है।
जहाँ तुम ही
सदा से ही
रहस्य के खजाने के वाहक रहे हो
सदा के लिए।
क्या तुम यह नहीं जानते?
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