Monday, June 6, 2011

28 सदैव सच पर अडिग रहो ताकि अनन्त में लौट सको।

 ताओ तेह किंग 28
एक मर्द की ताकत जानो
पर एक औरत की देखभाल का ध्यान रखो।
ब्रहमांण्ड की एक धारा हो रहो
ब्रहमाण्ड की एक धारा होने के नाते
सदैव सच पर अडिग रहो
ताकि फिर से
एक छोटे बच्चे से हो सको।

सफेद को जानो
कालिमा को संभालो
दुनियां के सामने उदाहरण बनो
और दुनियां का उदाहरण होने के नाते
सदैव सच पर अडिग रहो
ताकि अनन्त में लौट सको।

आदर को जानो
तो भी विनम्रता को संभालो
ब्रह्माण्ड की घाटी हो रहो
ब्रह्माण्ड की घाटी होने के नाते
सदैव सच्चे और साधनसंपन्न रहो
ताकि अपनी अनघड़ अवस्था में लौट सको।

जब कोई लकड़ी का लड्ठा तराशा जाता है
तो वह अनुपयोगी हो जाता है
जब कोई साधु इसका इस्तेमाल करता है, वह नियंता हो सकता है,
क्‍योंकि‍ वह न्‍यूनतम काटता छांटता है। 

Saturday, June 4, 2011

46 इच्छा से बड़ा कोई पाप नहीं है

ताओ तेह किंग 46
जब ब्रह्मांड में ताओ मौजूद होता है तो
घोड़े खाद ढोते/घसीटते हैं
जब ताओ ब्रह्मांड में मौजूद नहीं होता
शहर के बाहर युद्धोन्मादी घोड़े जन्म लेते हैं

इच्छा से बड़ा कोई पाप नहीं है
असंतोष से बड़ा अभिशाप नहीं है
अपने लिए कुछ भी मांगने से बड़ा दुर्भाग्य नहीं है
इसलिए वो जो कि जानता है कि काफी ही काफी है, उसके पास हमेशा काफी रहता है।

Friday, June 3, 2011

27 उससे अभी तक कोई भी जुदा नहीं हो पाया है।

ताओ तेह किंग 27

एक अच्छी चालढाल वाला आदमी अपने पैरों के निशान नहीं छोड़ता।
एक अच्छे वक्ता की जुबान नहीं फिसलती।
एक अच्छे अनुमान लगाने वाले को गिनने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक मजबूत दरवाजे को ताले की आवश्यकता नहीं होती -
उसे अभी तक कोई नहीं खोल पाया।
अच्छे बंधन के लिए, गांठें लगाने की जरूरत नहीं होती-
क्योंकि अभी तक कोई भी उससे खुल नहीं पाया है।


इसलिए साधु सभी इंसानों का ध्यान रखता है,
किसी एक को भी नहीं छोड़ता।
वह सभी चीजों का ध्यान रखता है,
और उससे कुछ भी नहीं छूटता।
इसे ही प्रकाश का अनुसरण करना कहते हैं।

एक अच्छा आदमी कौन है?
एक बुरे आदमी का शिक्षक।
एक बुरा आदमी कौन है
जिसके आधिपत्य में भला आदमी है।
यदि शिक्षकों का आदर नहीं होगा
और शिष्यों का ध्यान नहीं रखा जायेगा
तो भ्रम पैदा होगा
चाहे कोई कितना ही बुद्धिमान हो।
यही रहस्य का मूलबिन्दु है।

26 एक स्थिर ही सारे चलायमान का आधार है


जो भारी है वह हल्के का मूल है
एक स्थिर ही सारे चलायमान का आधार है

इसलिए साधु सारा दिन सफर में रहते हैं
और अपनी गठरी पर नजर रखता है
हालांकि यहां कई सुन्दर चीजें देखने को हैं
वह सबसे (अ-जुड़ा) अममत्व में,
ओर शांत रहता है

क्यों दसियों हजारों रथों का स्वामी
जनता में लड़खड़ाता हुआ चलता है
हल्का होना, अपनी जड़ों से उखड़ना है
अशांत होना, अपने पर ही नियंत्रण खोना है

Thursday, June 2, 2011

अच्छे वर्षों को युद्ध के लिए ना बितायें

ताओ तेह किंग 30
अगर आप ताओ के तरीके से किसी शासक को सुझाव दें
तो यह सलाह दें ब्रह्माण्ड को जीतने हेतु ताकत का इस्तेमाल ना करें।
यह केवल प्रतिरोध का कारण होगा।
जहां से भी सैनिकों के बूट गुजरते हैं, कंटीली झाडि़यां उग आती हैं।

अच्छे वर्षों को युद्ध के लिए ना बितायें
बस वही करें जिसकी आवश्यकता है
शक्ति का अन्यथा लाभ ना उठायें।

उपलब्धियां हासिल करें
पर उनकी महिमा ना गाने लगें।
उपलब्धियां हासिल करें
लेकिन शेखी ना बघारें
उपलब्धियां हासिल करें
लेकिन अभिमान ना करें
उपलब्धियां हासिल करें
क्योंकि यह प्राकृतिक तरीका है
उपलब्धियां हासिल करें
लेकिन हिंसा के द्वारा नहीं।

बलप्रयोग के पीछे पीछे ही शक्ति का पतन चला आता है,
यह ताओ का तरीका नहीं है
जो भी ताओ के विपरीत जाता है
जल्द ही परिणिति को पहुंचता है।

25 सदैव अभी यहीं, और गतिमान


कुछ रहस्यात्मक तरीकों से गढ़ा गया है
स्वर्ग और पृथ्वी से पहले जन्मा है
चुप्पी और शून्य में
अपने आप में अकेला खड़ा है, बिना बदले अपरिवर्तनीय
सदैव अभी यहीं, और गतिमान
जो संसार की करोड़ों चीजों की जननी है
मैं उसका नाम नहीं जानता
उसे ताओ कहता हूं
और बेहतर शब्द की कमी के कारण
महान !

वो महान, बहता है
वो बहुत दूर बहता है
चला ही जाता है और
लौट आता है

इसलिए ताओ महान है
स्वर्ग महान है
धरती महान है
राजा महान है
यह ब्रहमाण्ड की चार महान शक्तियां हैं
और राजा इनमें से ही एक है

इंसान धरती का अनुसरण करता है
धरती स्वर्ग का अनुसरण करती है
स्वर्ग ताओ का अनुसरण करता है
ताओ अपनी ही प्रकृति‍ का अनुसरण करता है

Wednesday, February 9, 2011

जिस प्रार्थना में मांग है, क्या वह प्रार्थना है?


कुदरतन जो पैदल चलता है, वो ईश्वर से साईकिल मांगता है? अब पैदल चलने वाला ईश्वर से फरारी की मांग कर सके इसके लिए उसका बहुत ही ईमानदार होना बहुत जरूरी है। ईमान यानि धर्म। यानि धार्मिक होना बहुत जरूरी है। तो क्या छोटी-छोटी इच्छाओं वाले धार्मिक नहीं होते? ये तो निहायत ही जायज लगता है कि पैदल चलने वाला भगवान से साईकिल मांगे, लेकिन अपनी मांग को अपना अधिकार मानने का जायजपना रखना ही किसी धार्मिक की भ्रष्टता है। मांगने में कैसा अधिकार? इसलिए कहा कि वही सरल ह्दय पैदल चलने वाला, सच्चा धार्मिक ही ईश्वर से फरारी या चन्द्रमा तक जाने वाले स्कूटर की मांग कर सकता है।
इच्छा रखना मात्र ही भ्रष्टता है। अब पैदल चलने वाला साईकिल की मांग करता है, साईकिल मिल जाने पर मोटरसाईकिल की मांग रखता है, मोटरसाईकिल मिल जाने पर कार और कार मिल जाने पर हवाई जहाज। आम लोग इस चक्र को ही जिन्दगी में तरक्की करना कहते हैं। लेकिन क्या यह भ्रष्टाचार का कुचक्र नहीं। पैदल चलने वाला थक जाता है, समय लगता है इसलिए साईकिल की मांग करता है। साईकिल शरीर से ही चलती है, उससे प्रदूषण नहीं होता। मोटरसाईकिल पाते ही वह साईकिल को भूल जाता है और यह भी कि मोटरसाईकिल धुंआ छोड़ती है, प्रदूषण फैलाती है। पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं मानसिक प्रदूषण भी। मोटरसाईकिल मालिक, साईकिल चलाने वाले को हिकारत की दृष्टि से देखने लगता है, कार वाला मोटरसाईकिल वाले को। इस भ्रष्ट कुचक्र का कोई अंत नहीं है, तो जब भी कोई ‘‘इच्छा’’ खड़ी हो  या प्रार्थना में मांग आये, सोचें कि यह किस कुचक्र में ले जायेगी।