Monday, October 31, 2016

त्यागने और छोड़ने को क्या है?

जो खोने और त्यागने योग्य हैं तो वो है कल्पनाएॅं.
जो कुछ भी यथार्थ है वह कभी भी हमारे जागने में बाधक नहीं बनता.
यह सारी काल्पनिक.सोची.विचारी चीजें ही हैं
जो हमें सोये रखने में सहायक होती हैं..और
हमें बस इन्हें ही छोड़ देना है।
पी डी ओस्पेंस्की
What one has to lose is imagination. Anything that is real is not an obstacle to awakening. It is the imaginary things that keep us asleep, and those we have to give up."
P. D. Ouspensky


Wednesday, June 17, 2015

अनेक रोगों की घरेलू औषधि है पान

पान भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत विभिन्न संस्कारों में हवन, यज्ञ, पूजन, देवार्पण आदि में पान की अनिवार्यता स्वीकारी गयी है। पान सत्कार का भी एक ऐसा सस्ता, सरल और उत्तम साधन है जो समाज में छोटे-बड़े, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब सभी को समानता और सम्मान की एकरूपता प्रदान करता है जो भारतीय पुरातन सांस्कृतिक समाजवाद का एक रूप है। आयुर्वेद में पान का अत्यधिक महत्व है। औषधि के रूप में पान का प्रयोग प्राचीन काल से ही होता आ रहा है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में पान का औषधि के रूप में प्रचुर उल्लेख मिलता है। पान स्वयं में एक औषधि है। इसके साथ ही कई प्रकार की औषधियों में भी पान का उपयोग होता है। पान को तम्बूल, नागबेल, नोगरबेल, बीटल लीप आदि के नामों से भी जाना जाता है। औषधीय कर प्रयोग के रूप में पान का निम्नानुसार प्रयोग किया जाता है।
* पान के रस को शहद के साथ चटाने के बच्चों की सूखी खांसी ठीक हो जाती है।
* पान के पत्तों का रस आंखों में डालने से रतौंधी की बीमारी में लाभ होता है।
* बच्चों की छाती में कफ भर गया हो तो पान पर अरंड (अंडी) का तेल लगाकर थोड़ा गरम करके छाती पर बांधते रहने से कफ निकल जाता है।
* बच्चों को अजीर्ण होने पर पान के रस में थोड़ा-सा शहद मिलकार चटायें। इससे अपान वायु निकल जाती है।
* सूखी खांसी एवं कुकुर खांसी में पान के रस से लाभ होता है। खांसी हेतु होने पर पान के रस को निकालकर थोड़ा गर्म करके दिन में तीन-चार बार तक पिलाते रहना चाहिए।
* सूखी खांसी में वच, अजवाइन और छोटी पीपल पान में रखकर रस चूसने खांसी ठीक हो जाती है।
* मिट्टी के तेल आदि की गंध हाथ में लग जाये तो पान के पत्ते को मल लेने से उसकी गंध निकल जाती है।
* कंठ में कफ भर जाने पर पान का रस, काली मिर्च का चूर्ण एवं शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें। शीतजन्य स्वर भंग होने पर पान के बीड़े में मुलहठी का चूर्ण डालकर सेवन करने से लाभ होता है।
* गांजा, भांग, अफीम और मदिरा के नशे को दूर करने के लिए पान के पत्तों के रस को छाछ के साथ मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
* पान के रस में दुगुनी शक्कर मिला कर सेवन करने से हृदय की दुर्बलता दूर होती है तथा इससे पाचन शक्ति भी बढ़ती है।

Tuesday, December 9, 2014

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष. यानि यदि आप इंसान के रूप में पैदा हुए हैं तो सबसे पहले यह जानना जरूरी था कि धर्म क्या है, इसके बाद जीवन में सार्थक क्या है यह जानना दूसरी प्राथमिकता थी, तीसरी थी — कामनाओं का स्वरूप जानना और चौथी और आखिरी चीज जो इन तीनों के बाद स्वयं आती थी (वैसे ही जैसे पेड़ से फल पक कर गिर जाता है यानि मोक्ष) ...
धर्म का मतलब किसी मनुष्य से दिखने वाले रोबोट में गीता, कुरान, बाइबिल जैसी किताबों के साफ्टवेयर इंस्टाल कर के हिंदू मुसलमान या ईसाई हो जाना नहीं होता। धर्म का मतलब है अपने तन मन रूह, अपने अस्तित्व की प्रकृति से अवगत होना।
अर्थ का मतलब...धन दौलत कमाने में ही जीवन की सार्थकता से नहीं.. बल्कि जीवन में क्या क्या अर्थवान है इसकी खोज है।
काम का अर्थ बच्चे पैदा करना नहीं होता।
काम का अर्थ है कामनाओं की समझ होना, इच्छा का स्वरूप पता होना, इंद्रियों के संसर्ग से इच्छा कैसे पैदा होती है और मन में अहं सी कुण्डली मारकर कैसे बैठ जाती है... इच्छा अपने होने को ही जीवन कैसे कहती है, इसकी खोज खबर रखना काम को जानना है।
मोक्ष का मतलब देह का विसर्जन सीखना, त्याग सीखना नहीं है। मोक्ष का मतलब आत्महत्या करना नहीं है। मोक्ष का मतलब जीवन मरण से मुक्ति नहीं है।
मोक्ष का अर्थ है जो मुक्त ही है उसे जान लेना, खुद से परिचित हो जाना....

Wednesday, January 22, 2014

ब्राम्ह्ण तीनों गुणों से परे होता है.



सत्, रज और तमस... इन तीनों गुणों में से किसी की भी पहुँच सत्य तक नहीं होती; ये तो डाकू-लुटेरों की तरह होते हैं, जो पकड़े जाने के डर से सार्वजनिक जगहों पर नहीं आते. 

एक बार एक आदमी जंगल से गुजर रहा था कि तीन डाकू अचानक प्रकट हुए और उन्होंने उस व्यक्ति के पास जो कुछ भी था सब लूट लिया। तब उनमें से एक डाकू बोला - इस आदमी को जिंदा छोड़ देने का क्या मतलब है? ऐसा कहते हुए वो डाकू अपनी कटार लेकर आदमी को मारने को उद्धत हुआ, तो दूसरा डाकू बाला- इसे मारकर भी हमें क्या मिल जायेगा? उस दूसरे डाकू ने आदमी को हाथ-पैर बाँधकर वहीं जंगल में छोड़ दिया। डाकू आगे बढ़ गये।

कुछ देर बाद ही तीसरा डाकू उस हाथ-पैर बंधे व्यक्ति के पास लौटा और बोला - ओह्, मुझे माफ करना। आप घायल हो? मैं आपको बंधनो से आजाद करता हूं। उसके हाथ-पैर खोलने के बाद वो डाकू बोला - मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें जंगल से बाहर, मुख्य मार्ग तक पहुंचा देता हूं। काफी देर बाद वह मुख्य सड़क तक पहुंचे। डाकू बोला- अब ठीक है, तुम इस सड़क पर सीधे चलते चले जाना, तो तुम अपने घर तक पहुंच जाओगे।
तब वह व्यक्ति बोला- आप तो मेरे लिए बहुत अच्छे रहे हैं, आपने मेरा बड़ा भला किया है, आप मेरे साथ मेर घर क्यों नहीं चलते। डाकू बोला-  नहीं, मैं वहां नहीं जा सकता। पुलिस मेरे बारे मे ंसब जानती है।

यह संसार भी एक जंगल की तरह है। जो तीन डाकू-लुटेरे यहाँ आपकी फिराक में हैं वो हैं सत्व, रजस और तमस। जो व्यक्ति यहां लुटा वो सत्य का ज्ञान है। तमस ज्ञान को नष्ट कर देना चाहता है। रजस मनुष्य को संसार से बाँधता है, पर सत्व होता है जो उसे तमस और रजस से मुक्त करता है। सत्व के संरक्षण में ही मनुष्य, क्रोध, भावावेश और तमस की अन्य शैतानी प्रवृत्तियों से बच पाता है। हालांकि सत्व हमें सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है तो भी वो है एक डाकू ही। सत्व मनुष्य को अंतिम सत्य का ज्ञान नहीं कराता तो भी वह मनुष्य को वह मार्ग दिखाता है जो ईश्वर तक ले जाये। वह मनुष्य को उस मार्ग तक ले जाता है जहां जाकर वह कहता है - यह है वो  मार्ग जिसके किसी सिरे पर तुम्हारा घर है। हालांकि सत्य भी ब्रम्हज्ञान से बहुत दूर होता है।

Friday, March 29, 2013

ईश्वर की छवि और ईश्वर का सच

ईश्वर इंसान जैसा कोई चरित्र नहीं हैं..ये अलग बात है कि वो ऐसा हो भी स​कता है और नहीं भी। ईश्वर को आपके जीने—मरने से कोई सरोकार भी नहीं होता, ये और बात है कि आप कुदरत के नियमों को जानते समझतें हैं... उसके हिसाब से चलते हैं तो आपकी उम्र काफी लंबी हो। 
ईश्वर को जानने वाले कभी यह नहीं कहते कि वो ईश्वर के प्रतिनिधि हो गये हैं और उन्हें कुछ खास तरह के अधिकार बख्शे गये हैं..ये अलग बात है कि उनके बारे में हमारी कुछ धारणाओं में ऐसा पाया जाता है. किसी देवी को जीभ काट कर चढ़ा देना, किसी सदमें से ना उबर पाने की पिनक में सन्यासी बन कर जिन्दगी भर भटकते रहना, ईश्वर के बारे में सोचते हुए पागल हो जाना, ईश्वर के नाम पर भीख मांगना और धनदौलत का साम्राज्य खड़ा करना...इन सब बातों का ईश्वर से कैसा रिश्ता हो सकता है?

बाबा बनकर भीड़ की साष्टांग दंडवतों के मज़े लेना, भीड़ को भेड़—बकरियों की तरह चराना..इससे किसी ईश्वर को क्या लेना देना। आप कौन सी भाषा बोल रहे हैं, किस ग्रह के और किस देश संस्कृति  में पले बढ़े हैं इस के हिसाब से आपके आराध्य तय होते हैं... ना कि एक ओरिजनल ईश्वर. 
आपकी इच्छाओं आकांक्षाओं और फिर असफलताओं और कुदरती आपदाओं से ईश्वर के क्या सरोकार हो सकते हैं? या बचपन, जवानी, बुढ़ापे में बंटी 100 बरसे की छोटी सी जिंदगी की उपलब्धियों अनुपलब्धियों से ... (आपके हिसाब से भी) सृष्टि चलाने वाले ईश्वर के क्या रिश्ता है.

Saturday, January 19, 2013

जब आप ये जानते हैं

अभी या फिर कभी
सौभाग्य या दुर्भाग्य
आपको बिता ही देगा,
जब आप ये जान जायेंगे-
आप से कोई भी इच्छा नहीं होगी.
आपको कोई भी शोक न होगा.
इन्द्रियां आपके अधीन होंगी
और आप आनंद में।

आपसे जो भी होगा
चाहे सुख लाये या दुख
जीवन या मृत्यु
जब आप ये जान जायेंगे
कि दुनियां तुम्हारे बगैर भी चलेगी,
आप मुक्तभाव से कर्म करेंगे
बिना किसी मोह या बंधन के.

सारे दुख और कहीं से नहीं
भय से आते हैं
जब आप ये जानते हैं
आप भय से मुक्त हो जाते हैं
और इच्छाएं खो जाती हैं

आप आनन्द में होते हैं
और शांत.

Sooner or later,
Fortune or misfortune
May befall you.

When you know this,
You desire nothing,
You grieve for nothing.

Subduing the senses,
You are happy.

Whatever you do
Brings joy or sorrow,
Life or death.

When you know this,
You may act freely,
Without attachment.

For what is there to accomplish?

All sorrow comes from fear.
From nothing else.

When you know this,
You become free of it,
And desire melts away.

You become happy
And still.

~ Ashtavakra Gita (11.3-5)

Monday, December 10, 2012

तू ना जाने आसपास है खुदा

धुंधला जायें जो मंजिले,
इक पल को तू नज़र झुका
झुक जाये सर जहां वहीं,
मिलता है रब का रास्ता
तेरी किस्मत तू बदल दे,
रख हिम्मत बस चल दे
तेरे साथी मेरे कदमों के हैं निशां
तू ना जाने आसपास है खुदा

खुद पे डाल तू नजर
हालातों से हारकर... कहां चला रे!
हाथ की लकीर को मोड़ता-मरोड़ता,है हौसला रे
तो खुद तेरे ख्वाबों के रंग में,
तू अपने जहां को भी रंग दे,
कि चलता हूं मैं तेरे संग में,
हो शाम भी तो क्या....
जब होगा अंधेरा
तब पायेगा दर मेरा
उस दर पे
फिर होगी तेरी सुबह
तू ना जाने आसपास है खुदा


मिट जाते हैं सबके निशां
बस एक वो मिटता नहीं
मान ले जो हर मुश्किल को मर्जी मेरी
हो हमसफर ना तेरा जब कहीं
साया मेरा रहेगा तब वहीं
तुझसे कभी भी ना इक पल मैं जुदा
तू ना जाने आसपास है खुदा