Thursday, September 17, 2009

‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 3

  • जो हमें ईश्वर प्रदत्त या सौभाग्यवश मिल गया है उस पर अभिमान न करके, दूसरों के सामने उसकी प्रशंसा, बखान या बढ़ाई न करके, उसे महत्वपूर्ण न मान कर हम दूसरों की ईष्र्या से बचे रह सकते हैं, इस तरह हम झगड़ों से भी बचे रह सकते हैं।
  • यदि हम संग्रहवृत्ति के हैं तो निश्चित ही हमें चिंता भी होगी। जिनके पास खजाना होता है उन्हें ही चोरों की चिंता होती है।
  • संग्रहवृत्ति को खत्म कर हम चैर्य कर्म (चोरी करने के काम, चोरी करन की आदत) को रोक सकते, और कुछ चोरी के डर या चोरी हो जाने से भी भय से भी मुक्त रह सकते हैं।
  • वस्तुओं को चाह की भावना से न देखकर हम मन के भ्रमों से बचे रह सकते हैं। लालसा, लोभ, आशाएं, उम्मीदें पालने से भी मनुष्य परेशान रहता है। लालसा, लोभ, आशाएं, उम्मीदें निश्चित ही अनावश्यक चीजें हैं। जो सहजतापूर्वक मिल जाए उसमें संतोष, शांति का कारक है।
  • भला आदमी मन के भार को हल्का कर, पेट भर भरने की छोटी सी चिंता, इच्छाओं को न्यूनतम कर और अपने संकल्पों को दृढ़ करके - स्वयं के द्वारा शासित रहता है।
  • यदि आदमी ज्ञानशून्य और इच्छाशून्य हो जाए तो तुच्छ-चालाक और कांईंया लोग किसी भी तरह के हस्तक्षेप की कोशिश भी न कर सकेंगे।
  • यदि आदमी ने कुछ भी नहीं किया गया है, तो सब कुछ ठीक ही होगा।

Thursday, September 10, 2009


‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 2




सभी स्वर्ग को सुन्दर कहते हैं केवल इसलिए नरक और कुरूपता भी जन्म ले लेते हैं।

सभी अच्छे को अच्छे के रूप में जानते हैं क्योंकि वहीं बुराई भी है।

इसलिए होना और नहीं होना एक साथ प्रकट होते हैं।

कठिन और सरल एक दूसरे के पूरक हैं।
बड़ा और छोटा एक दूसरे से हैं।
ऊँचा और नीचा एक दूसरे से ऊपर नीचे हैं।
सुर और शोर एक दूसरे को संतुलित करते हैं।
अगला और पिछला एक दूसरे का अनुगमन करता है।

इसलिए संत ‘‘कुछ न करना’’ करते हैं। मौन रहना सिखाते हैं।

क्या ऐसा नहीं होता कि हजारों चीजें बिना प्रकटाये पैदा होती हैं
और बिना रोके या समाप्त किये खत्म हो जाती या रुक जाती हैं?

तो काम करो, पर उसका श्रेय न लो।
काम खत्म हुआ तो खत्म हुआ, फिर उसे याद क्यों रखना?

जो ऐसा होता है, वह हमेशा रहता है।

Saturday, September 5, 2009

ईश्वर क्या है?

ईश्वर क्या है?
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 1

  1. जो कहा जा सकता है वह यथार्थ में या मूलतः ताओ नहीं।
  2. ताओ को यथार्थतः व्यक्त नहीं किया जा सकता।
  3. जिस किसी भी व्यक्ति या वस्तु आदि को जो नाम दिया जाता है वह उसका मूल नाम नहीं होता, संज्ञा मात्र होती है।
  4. उस अनाम ईश्वर से ही स्वर्ग और धरती जैसी चीजें जन्मी।
  5. जिसे नामरूप में ईश्वर या व्यक्त ईश्वर के रूप में जाना जाता है वह ही अन्य हजारों व्यक्त चीजों का जन्मदाता या माता है।
  6. हमेशा कोई वासनाशून्य ही, उस अव्यक्त रहस्य को देख पाता है।
  7. हमेशा कोई इच्छा रखने वाला, उसे व्यक्त रूप में देखता है।
  8. यह दोनों नामों अन्तर (व्यक्त और अव्यक्त) मात्र से एक ही स्रोत प्रकट होते हैं। वो मूल स्रोत गहन है।
  9. वो गहन से भी गहनतम, परम गहन है।
  10. वो सभी रहस्यों का द्वार है।
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लाओत्से ‘‘ताओ तेह किंग’’ एक परिचय


भगवान बुद्ध के समकालीन लाओत्से का जन्म चीन के त्च्यु प्रदेश में ईसा पूर्व 605 में माना जाता है। वह एक सरकारी पुस्तकालय में लगभग 4 दशक तक ग्रन्थपाल रहे। कार्यनिवृत्त होने पर वह लिंगपो पर्वतों पर ध्यान चिन्तन करने निकल गये।

जब 33 वर्षीय कन्फ्यूशियस ने आदरणीय लाओत्से से मुलाकात की थी तब वे 87 वर्ष के थे। कन्फ्यूशियस पर उनके दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा।

उन्हंे आखिरी बार उस समय देखा गया जब वे एक यात्रा के दौरान क्वानयिन दर्रे से बाहर निकल रहे थे। वहां से निकलते वक्त नाके पर खड़े टोलटैक्स अधिकारी या द्वारपाल ने उनसे टैक्स मांगा, धन के अर्थ से परे उस महापुरुष ने उस व्यक्ति को अपने 644 बोध वचनों से समृद्ध किया।

यह किस्सा कुछ वैसा ही जैसा श्री राम के नदी पार करने पर केवल द्वारा मांगा गया शुल्क, जिसके बदले में वे संसार को तारने वाले वचन कहें।

‘लाओत्से’ का अर्थ ‘बूढ़ा दार्शनिक’ होता है, इसके अतिरिक्त एक और अर्थ निकलता है ‘‘बूढ़ा बच्चा’’। उनके ही ये शब्द उनकी छवि गढ़ते हैं:
”जो मूर्तिमान धर्म बन गया, वह छोटे बच्चे जैसा होता है। बिच्छू उसे नहीं डसता, जंगली पशु उस पर नहीं झपटता और हिंस्र पक्षी उसे चोंच नहीं मारता।
उसमें शक्ति और उत्साह मानो उमड़ता रहता है। फिर भी उसे अपने स्त्रीत्व या पुरुषत्व का भान नहीं रहता।“

मुझे जानने वाले इने गिने ही हैं। मेरी कृतियों में श्रेष्ठ धर्म निहित है।
मेरे शब्दों को समझना और उन पर आचरण करना सरल है, फिर भी कोई उसे समझने या आचरण करने में समर्थ नहीं।
ताओ हद्य परिवर्तन का धर्म है। यह दिव्यता का अनुवर्तन है।
सारी दुनिया कुबूल करती है कि ताओ मार्ग श्रेष्ठ है लेकिन यह भी कहती है कि वह बेकार है।
जिस कारण वह बेकार मालूम पड़ता है, वही उसकी श्रेष्ठता है।

यह भी निश्चित नहीं कि यह अक्षरशः लाओत्से के ही शब्द हैं या उस द्वारपाल के अपने शब्दों में लाओत्से के वचनों का भाव अंकित है। बाद में इन वचनों को 81 प्रकरणों में बांटा और उनका नामकरण किया गया। इस ग्रंथ को “ताओ तेह” नाम दिया गया।

लाओत्से के बोधवचनों के वास्तविक भाष्यकार च्युंगत्सी हैं। च्युंगत्सी (सू) ने लाओत्से के वचनों को एक दर्शन के रूप में विश्व को दिया। ताओ मार्ग के अनुयायियों की संख्या बढ़ी और कालांतर में यह एक धर्म ग्रंथ ‘‘ताओ तेह किंग’’ के नाम से पुकारा जाने लगा।

ताओ का अर्थ वेदों के ओंकार के समान है।

लाओत्से के अनुसार -
मैं उसका नाम नहीं जानता, वह तत् है। ताओ में चाहे जो डालिये वह बढ़ेगा नहीं और जितना निकाल लें उसमें कुछ कमी नहीं होती।

यह अर्थ भी उपनिषद के श्लोक - पूर्णमिदं पूर्णमादाय पूणात्मुच्यते......... के समान है।

तेह का अर्थ सहज प्रकाश का प्रकट होने का मार्ग है। ताओ में जानबूझकर, सआयास कुछ करना पाप का मूल माना गया है। इसलिए लाओत्से ने इसे एक धर्म का नाम भी नहीं दिया गया।
लाओत्से पूछता है -
क्या फूल को अपने अंदर खुशबू भरनी या उसके लिए कोशिश करनी पड़ती है? वह सहज रूप में ही अपना जीवन बिताता है।
लोग कहते हैं कि वो सुगंध देता है लेकिन यह तो फूल का स्वभाव है, इसके लिए वह कर्ता नहीं।
लाओत्से कहते हैं यह ”गुण प्रकाश” का मार्ग है।
मनुष्य का सबसे बड़ा धन या साम्राज्य वासनाशून्य हो जाना है। इसके लिए श्रम की जरूरत ही कया है?
क्योंकि ‘कुछ करना चाहिए’ इस भावना को त्यागना है। कुछ होने की भावना से निवृत्ति ही सबसे बड़ा कर्म है।


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साभार: उपरोक्त सामग्री ताओ उपनिषद्, मराठी अनुवाद - मनोहर दिवाण, मराठी से हिन्दी अनुवाद - गोविन्द नरहरि वैजापुरकर, प्रकाशक: सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट वाराणसी से साभार ली जा कर राजेशा द्वारा सरल-सहजीकरण और मूल अर्थों तक पहुँच के भाव से संपादित है।
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Saturday, August 29, 2009

पतंजलि योगसूत्र, समाधिपाद अध्याय, सूत्र-5, 6, 7

सूत्र 5
वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः।।

वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं तथा उनमें से कुछ क्लिष्ट और अन्य अक्लिष्ट होती हैं।
क्लिष्ट का अर्थ इन वृत्तियों के उलझनभरे होने की शक्ति से है। यानि मन की कुछ बातें तो आसानी से समझ आ जाती हैं पर ‘कुछ समझ आती लगती‘ होने पर भी समझ नहीं आती।
यही वर्तमान आधुनिक मनोविज्ञान की कठिनाई है। कई मनोरोगों को समझने में अभी भी कठिनाई आती है। कभी कभी तो यह भी समझ नहीं आता कि यह शारीरिक है अथवा मानसिक।

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सूत्र 6
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।।

वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं - प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
1. प्रमाण - यानि प्रमाणित, सत्य, सच्ची एक दूसरा अर्थ घटने और बढ़ने वाली
2. विपर्यय - विपर्यय यानि जो पर्याय नहीं है झूठ, असत्य
3. विकल्प - काल्पनिक मात्र
4. निद्रा - गहरी नींद
5. स्मृति - स्मरण, यादें

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सूत्र 7
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।

प्रमाण वृत्ति के तीन भेद हैं: प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम।

- प्रत्यक्ष होना,साक्षात् होना पहला उपाय है।
- अनुमान, अंदाजे से ज्ञान
- आगम, यानि अतीत से प्राप्त ज्ञान, पूर्व से आया ज्ञान।

Thursday, August 27, 2009

पतंजलि योगसूत्र, समाधिपाद अध्याय, सूत्र-4

।। वृत्तिसारूप्‍यमितरत्र
।।

पतंजलि का तीसरे सूत्र के अर्थअनुक्रम में चौथे सूत्र के अनुसार, उस समय दृष्टा पुरुष की चित्त-वृत्तियों से ही सारूप्यता रहती है।

तीसरे सूत्र में कहा गया कि योग चित्त की वृत्तियों का निरोधोपरांत दृष्टा पुरुष अपने मूल स्वरूप में स्थित रहता है। इस सूत्र में उससे आगे की बात है कि यदि चित्त की वृत्तियों का निरोध नहीं किया जाता। चित्त की वृत्तियों को यथार्थतः नहीं जान लिया जाता है तो ये वृत्तियाँ ही चेतनापुरुष के चित्त पर हावी होकर कर्ताधर्ता बनी दिखती हैं। उस समय दृष्टा यानि चेतनापुरुष के चित्त की वृृत्तियों से एकरूपता रहती है।

सांख्य तथा योगदर्शन अनुसार चेतनापुरूषतत्व अनादि, अकर्ता, अहेतुक, अपरिणामी है। शरीर मन या चित्त से इसका संयोग ही माया है।

Tuesday, August 25, 2009

पतंजलि योगसूत्र, समाधिपाद अध्याय, सूत्र-3

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽस्थानम्।

उस समय द्रष्टा अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है।

दूसरे सूत्र के अनुक्रम में यह सूत्र कहता है - कि जब चित्त की वृत्तियाँ, उसके धंधें कहाँ-कहाँ तक फैले हुए हैं यह जान जाता है तो दृष्टा अपने मूल स्वरूप में स्थित होता है।