- जब परमात्मा को भूला दिया जाता है, तब दिखावटी दयालुता और नैतिकता प्रकट करने का फैशन आ जाता है।
- जब पांडित्य और छद्म अक्लमंदी पैदा होते हैं तब महान पाखंड शुरू होते हैं।
- जब अपने घर में शांति नहीं मिलती तब झूठी भक्ति और धार्मिकता का आचरण प्रारंभ किया जाता है।
- जब देश भ्रम और अराजकता में हो तब ईमानदार अधिकारियों का प्रादुर्भाव होता है।
इन सब का तात्पर्य क्या यह नहीं कि असली सिक्कों की कमी होने पर खोटे सिक्के चलन में आ जाते हैं।
Friday, October 16, 2009
Tuesday, October 13, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 17
- जो जरा सा भी मुश्किल होता है उसे कम ही लोग जानते हैं। उनसे भी कम लोग उसे अमल में लाते हैं। और उनसे भी कम लोग विवेक के मार्ग पर बने रहते हैं।
- डरे और भीरू लोग जिन्हें खुद पर ही विश्वास नहीं उन पर विश्वास कैसे किया जा सकता है?
- जब बिना कुछ कहे सुने काम हो जाता है तो लोग लोग अहं से भरकर कहते हैं ”हमने कर दिखाया।“
Monday, October 12, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 16
- खुद को सब चीजों से खाली कर लो।
- मन स्थिर हो।
- जब कोई अपने तक, अपनी वापसी देखता है तो हजारों चीजें प्रकट और विलीन होती दिखती हैं।
- स्रोत की ओर लौटना, स्थैर्य है, जो प्रकृति का अपना तरीका है।
- प्रकृति के तरीके या ढंग अपरिवर्तनीय हैं।
- स्थैर्य (स्थिरता) को जानना ही अंर्तदृष्टि है।
- स्थैर्य (स्थिरता) को न जानना अनिष्ट की ओर ले जाता है।
- स्थैर्य को जानने से मन खुलता है।
- खुले मन से आप हार्दिक होते हैं।
- हार्दिक, ह्रदय से होने पर आप जो करते हैं वह धार्मिक होता है।
- धार्मिक होने पर अप दिव्य को प्राप्त होते हैं।
- दिव्य होने पर ही आप ईश्वर से सायुज्य कर सकते हैं।
- ईश्वर से सायुज्य में सबकुछ निहित है।
Saturday, October 10, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 15
- प्राचीन गुरू गूढ़, रहस्यमय, अगाध गंभीर और अनुक्रियाशील पाये जाते हैं।
- ज्ञान की गहराई अथाह है, क्योंकि वह अथाह है।
- हम जो कुछ भी करते हैं वह प्रकट को ही विस्तार देता विवरण होता है।
- खतरे को भांपता हुआ व्यक्ति कितना सजग होता है।
- मन कभी, मेहमाननवाजी में लगे व्यक्ति-सा सौजन्यपूर्ण होता है।
- मन कभी, पिघलती बर्फ सा घुलनशील होता है।
- मन कभी, अनगढ़ लकड़ी के ठूंठ सा सरल होता है।
- मन कभी, गहरी गुफाओं की तरह खाली होता है।
- मन कभी, मैले तालाब की तरह गंदला होता है।
- कौन इस बात का इंतजार करता है कि गंदलापन तली में बैठ जाए,पानी निथर जाये?
- कौन कर्म की गति में स्थिर बन रहता है?
- परमात्मा की ओर देखने वाला वासनाओं की पूर्ति के मार्ग नहीं ढूंढता।
Friday, October 9, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 14
- देखो, वह दिखता नहीं है - वह रूपाकारों से परे है।
सुनो, वह सुनाई नहीं देता- वह ध्वनियों से परे है।
ग्रहण करो, वह पकड़ाई में नहीं आता - वह अमूर्त है।
यह सब अपरिभाषेय है।
इसलिये ये एक में ही समाहित हैं।
- वह ऊपर से चमकीला नहीं।
वह नीचे से काला नहीं।
वह विवरण से अटूट रूप से जुड़ा सूत्र है।
वह कहीं भी वापस नहीं जाता।
या वह ‘कहीं नहीं’ की ओर वापस जाता है।
वह अरूप का रूप है।
वह अमूर्तता की छवि है।
वह अपरिभाषेय है और कल्पनातीत है।
- उसके आगे चलो तो पाओगे उसका आरंभ कहीं नहीं मिलता।
उसका पीछा करो, तो अंत भी नहीं दिखता।
उस परमात्मा के साथ ही चलो,
इसी क्षण में जिओ।
प्राचीन और आदि का ज्ञान, परमात्मा का सार है।
Tuesday, October 6, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 13
- देह के साथ ही दुर्भाग्य भी आता है, शरीर के बिना कैसा दुर्भाग्य?
- लाभ हानि की परवाह किये बिना अपने आपको पूर्णतः समर्पित कर दो, इससे आप सब चीजों पर विश्वास कर पायेंगे और उनका खयाल रख सकेंगे।
- संसार से वैसे ही प्यार करो जैसे तुम स्वयं से करते हो इस तरह आप सारे संसार की सच्ची देखभाल कर पाएंगें।
Monday, October 5, 2009
‘‘ताओ तेह किंग’’ अध्याय 12
- हमारी आंखें सदा चित्र-विचित्र स्वप्नलोकों में ही रहना चाहती हैं। सतरंगे सपनों से चैंधियां कर हम अंधे ही हो जाते हैं।
- मधुर स्वर, गीत-गान और तरह-तरह की जादूई शब्दों की समरसता के चक्कर और मीठी आवाजों से हम बहरे के समान बेसुध हो जाते हैं।
- हमारी जीभ तरह-तरह के स्वादों में डूबकर पेट तक जाने क्या क्या पहुंचाती रहती है जो हमारे शरीर को अपनी उम्र ही पूरी नहीं करने देती।
- आदमी खत्म हो जाता है, इन्द्रियों के अनुभवों की चाहत कभी खत्म नहीं होती।
- महत्वाकांक्षाओं की दौड़ आदमी को पागल बनाकर छोड़ देती है।
- इसलिए कीमती लोग इन सब चक्करों में नहीं पड़ते।
- साधुजन, जो दिख रहा है उससे नहीं बल्कि अपने विवेक से निर्देशित होते हैं। वह सर्वश्रेष्ठ ही चुनता और उस पर चलता है।
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