Thursday, June 17, 2010

तेरे दिल में है खुदा जाहिर कर

 तेरे दिल में है क्या जाहिर कर
इसमें रहता है खुदा जाहिर कर

छोड़ दे उसकी रजा पर सब कुछ
तेरी उससे है रजा जाहिर कर

सांस मिटने पे सभी मिटते हैं
जीते जी मिटना है क्या जाहिर कर

सारी दुनियां ही सपने में गुम है
सच है कैसी, क्या बला, जाहिर कर

Saturday, March 20, 2010

अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।

दया धरम हिरदे बसै, बोलै अमरित बैन।
तेई ऊँचे जानिये, जिनके नीचे नैन॥
दया और धर्म उसके ह्रदय में बसते हैं, उसकी वाणी में मिठास होती है, ऐसे लोगों के नैन वि‍नम्रतावश सदा नीचे की ओर झुके रहते हैं मलूकदास जी कह रहे हैं यही उच्चेकोटि के लोगों की पहचान है।


आदर मान, महत्व, सत, बालापन को नेहु।
यह चारों तबहीं गए जबहिं कहा कछु देहु॥
आदर, मान, महत्व, सत्य और बचपन का प्यार... ये चारों ही उस वक्त गायब हो जाते हैं जब किसी से कोई कुछ मॉंग लेता है।

इस जीने का गर्व क्या, कहाँ देह की प्रीत।
बात कहत ढर जात है, बालू की सी भीत॥


इस जीवन का गर्व क्या करना? ऐसी देह से प्रीत भी क्यों लगानी? इसकी बड़ी-बड़ी बातें पल भर मंे ही रेत की दीवार की तरह ढह जाती हैं।

अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास 'मलूका कह गए, सबके दाता राम॥
न तो अजगर काम काज या नौकरी करता है, ना ही पंछी काम धंधे पर जाते हैं फिर भी परमात्मा की मर्जी से सारा संसार चलता रहता है, वही सबको सबकुछ देने वाला है।

Tuesday, March 2, 2010

कुछ भी करना, जो है उसमें दखल देना है

इसलि‍ये जो हो रहा है
उसे
केवल देखें,
उसमें बाधाएं पैदा ना करें।

ना ही रोयें गायें
ना ही इतरायें इठलायें
ना ही जोड़े घटायें।

क्‍योंकि‍
जब भी तुमने कुछ कि‍या
जब भी तुम कर्ता बने
दूसरा सि‍रा भी साथ्‍ा ही चलने लगता है
भला करने चलोगे, तो बुरा भी होगा।

तो अपने बस में यही है
कि‍ देखें
क्‍योंकि‍ देखने से ही असली चीज होती है
जो तुमसे होनी चाहि‍ये
और उस होने में
कोई बाधा नहीं बन सकता
तुम्‍हारी दुनि‍यां का
कोई ईश्‍वर भी नहीं।

Saturday, January 30, 2010

एकरसता

अगर मैं बैठा रहता हूं
या लेटा रहता हूं
तो यह बैठना और लेटना
एकरसता बोरियत लाती है।

मैं चलना शुरू करता हूं
तो पहले पहल
मजा आता है
और दूरियां नापने में ही
सार्थकता समझ आती है।

फिर थकानों से मिलने,
नये नये दृश्य देखने का शगल भी
एकरसता हो जाता है।

मैं चाहता हूं
मैं ठहरूं भी
मैं पुराने ही दृश्य
फिर एक बार देखूं

मैं चाहता हूं
फिर बैठा रहूं
या लेटा रहूं।
फुर्सत के दिनों की तरह।

सारी हवस
पहले-पहल
जरूरतों की शक्ल में ही आती है,
फिर आदत बन जाती है

जरूरतों की राह चलते-चलते,
हवस के जंगल में भटक जाता है आदमी

तो किसी भी चीज को
‘जरूरत की मान्यता’ देने के पहले
आदमी को
दो लाख बार सोचना चाहिये।

छोटी-छोटी देहों में ही, ये सारे ब्रम्हांड बढ़े हैं
अंकुर की नींदों में देखो, कितने सारे वृक्ष खड़े हैं

Monday, December 14, 2009

तेरा खेल

कोई वजह नहीं है कि तुझे याद किया जाये
और तुझे कोई याद कर भी नहीं रहा है
और तुझे फर्क भी नहीं पड़ता
कि कोई तुझे याद करे ना करे

बस हम जैसे इंसान
दिखावटी अध्यात्म और धर्म के नाम पर
मन के धोखों में
या अपनी निराशाओं के झोंकों में
तुझे याद करते हैं
किसी रोगी की तरह
जिसके मुंह से निकलने वाली
दर्द और बेबसी की आवाजें
उसकी अपनी मर्जी नहीं होतीं
बच्चों और
उसके जैसे अन्य रोगि‍यों के सिवा
उसके पास मंडराते
और चालू, चलते फिरते लोग
उस पर तेरे डर की वजह से
हंसते भी नहीं है

सब मग्न हैं उस खेल में
जिसे बस तू ही खेल की तरह खेलता है
बाकी सब बड़ी गंभीरतापूर्वक अपनी पारियां
टाईमपास कर बिता रहे हैं
बोझ सा लगता है जिन्दगी का खेल
आठ दस घंटें की नौकरी या धंधा पानी
और संडे के संडे सोचना
कि ये सांसों की कहानी
फ्लॉप फिल्म सी
किसी गांव के सिनमा घर में
टाईमपास के लिए इकट्ठे गंवारों में भी
सुनी देखी नहीं जायेगी

हालांकि किसी की जिन्दगी
किसी के लिए फिल्म हो
ये कोई भी नहीं चाहता
फिर भी सबके लिए, सबकी जिन्दगी
एक फिल्मी सीन की तरह है