Wednesday, February 22, 2017

श्री गुरू पादुका स्त्रोत्रम

अनंत संसार समुद्र तार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्यां।
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥१॥

उन गुरू की जो संसार रूपी अनंत समुद्र को पार करने के लिए
महानभक्ति रूपी नौका प्रदान करते हैं,
या अनंत संसार रूपी समुद्र को तारने वाली जो नौका की तरह है उस गुरू की,
जो वैराग्य रूपी साम्राज्य को प्रदान करने वाले हैं,
जो वैराग्य रूपी साम्राज्य में जो पूजनीय हैं उन गुरूओं की
हम चरण वंदना करते हैं।
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इस संसार रूपी अनंत समुद्र को गुरूभक्ति् रूपी नौका से पार करने योग्य बनाने वाले
और अमूल्य वैराग्य के साम्राज्य की राह दिखाने वाले गुरू के चरण वन्दना।
The crossing of this Endless ocean of samsara is enabled
by the boat that is sincere devotion to Guru
Showing me the way to the valuable dominion of renunciation,
O dear Guru, I bow to thy holy sandals.
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कवित्व वाराशि निशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावांबुदमालिक्याभ्यां।
दूरीकृतानम्र विपत्तिताभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥२॥
ज्ञान के परम सागर पूर्णकला वाले चन्द्रमा की तरह और
जो दुर्भाग्य की ज्वालाओं पर भारी जलधार की बौछार की तरह हैं,
जो अपनी शरण में आने वालों को विपत्तियों से दूर रखने हैं
उन गुरू की चरण वन्दना।
Like a full moon for the ocean of the Knowledge,
Like down pour of water to put out the fire of misfortunes,
Removing the various distresses of those who surrender to them,
O dear Gurudev, I bow to thy holy sandals.
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नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।
मूकाश्च वाचसपतितां हि ताभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥३॥
जिन शुभ चरणों में रहने से ज्ञान रूपी महान खजाने के आधिपत्य मिल जाता है और
अज्ञान के अभिशाप रूपी दरिद्रता से उबरना हो जाता है, मुक्ति मिल जाती है और
वो जो गूंगों को भी देवगुरू वृहस्पति सा बोलने वाला (वाकपटु) बना देते हैं
उन गुरू की चरण वन्दना।
Those who prostrate to the blessed padukas of their Guru
become possessors of great wealth
and overcome the curse of their poverty very quickly.
To such padukas my infinite prostrations.
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नाली कनी काशपदाहृताभ्यां नानाविमोहादि निवारिकाभ्यां।
नमज्जनाभीष्ट ततिब्रदाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥४॥
वो गुरू जिनके कमल चरणों की ओर हम खिंचे चले जाते हैं,
जिन्होंने हमारी कई इच्छाओं /मोह आदि का निवारण किया हैं और
जिनके चरणों में नत रहने से अभीष्ट वर मिलते ही रहते हैं
उन गुरू की चरण वन्दना।
Attracting us to the Lotus-like feet of our Guru,
removing all kinds of desires borne out of ignorance,
fulfilling all the desires of the disciple who bows humbly
To such padukas I humbly offer my obeisance.
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नृपालिमौलि ब्रज रत्न कांति सरिद्विराज्झषकन्यकाभ्यां।
नृपत्वदाभ्यां नतलोकपंक्ते: नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥५॥
किसी राजा के मुकुट में चमकने वाले प्रमुख मणि की तरह जो शिष्यों को
किसी नदी के मगर मच्छों के बीच निर्भय रहने वाली नवयौवना की तरह बना देते हैं,
जो आत्मज्ञान का संप्रभुत्वसम्पन्न राज्य देते हैं
उन गुरू की चरण वन्दना।
Shining like a precious stone adorning the crown of a king
They stand out like a beautiful damsel in a river infested with crocodiles
They raise the devotees to the state of sovereign emperors,
To such padukas I humbly offer my obeisance.
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पापांधकारार्क परंपराभ्यां पापत्रयाहीन्द्र खगेश्वराभ्यां।
जाड्याब्धि संशोषण वाड्वाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥६॥
जो शिष्य के पाप और अनन्त अज्ञान अंधकार के लोक से
अप्रभावित सूर्य की तरह आलोकित रहते हैं,
जो हमारे तीन तरह के मानसिकवाचिककायिक,
दैहिक दै​विक मानसिक पाप रूपी सर्पों के लिए गरूड़ के समान हैं
जो हद्दय के अज्ञान कीचड़ रूपी समुद्र को दावानल की तरह सुखा देते हैं
उन गुरू की चरण वन्दना।
Shining radiantly like the Sun, effacing the endless darkness of the disciples sins,
Like an eagle for the snake like three-fold pains of Samsara
like a conflagration of fire whose heat dries away the
ocean of ignorance
To such supreme padukas of my Gurudev, I humbly surrender.
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शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां समाधि दान व्रत दीक्षिताभ्यां।
रमाधवांघ्रि स्थिरभक्तिदाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥७॥

हमारे हदय को शमादिषट्क (शम दम उपरति तितिक्षा समाधान श्रद्धा )
ऐसें षट्क भावों का वैभव प्रदान करने वाले और
समाधि दान व्रत में दीक्षित करने वाले, ​और
जिन्होंने हमें रमापति विष्णु के चरणों में सदास्थिर रहने वाली भक्ति दी
उन गुरू की चरण वन्दना।
They endow us with the glorious six qualities like Shama,
They vow to bless the intiated ones with the ability to go into samadhi.
Blessing the devotees with permanent devotion for the feet of Lord Vishnu(Ramaadhava)
To such divine padukas I offer my prayers.
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स्वार्चापराणाम खिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्ष धुरंधराभ्यां।
स्वान्ताच्छ भावप्रदपूजनाभ्यां नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥८॥
स्व अर्चित पराणाम अखिल इष्ट दाभ्यां
स्वाहा सहायाश्च धुरंधराभ्याम्

शिष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले
मुमुक्षुओं की सेवा में अपना समस्त स्वाहा करने को तत्पर और धुरंधर,
गंभीरज्ञानियों का आत्मज्ञान की दिव्य अवस्था में पदार्पण कराने वाले
उन गुरू की चरण वन्दना।
Fulfilling all the wishes of the disciples,

Who are ever-available and dedicated for Sewa,
Awakening the sincere aspirants to the divine state of self realization,
Again and again prostrate to those Padukas of my Poojya Gurudev
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कामादिसर्प व्रजगारुडाभ्यां
विवेक वैराग्य निधि प्रदाभ्यां।
बोध प्रदाभ्यां दृत मोक्ष दाभ्यां
नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां॥९॥
जो हमारे कामआदिभाव जैसे महाविषैले सर्पों के लिए गरूड़ के समान हैं.
जो कामआदिभाव जैसे महाविषैले सर्पों को गरूड़ के समान हर लेने वाले हैं
विवेक—वैराग्य का खजाना देने वाले हैं
जो परमबोध देने वालें हैं
जो तुरंत ही मोक्ष देने वालें हैं
They are like an eagle for all the serpents of desires,
Blessing us with the valuable treasure of discrimination and renunciation,
Granting us the knowledge to get instant liberation from the shackles of the life,
My prostrations to those holy Padukas of my Guru.

Tuesday, November 1, 2016

॥ अष्टावक्र गीता ॥ ~ 20 श्लोंकों का प्रथम अध्याय

॥ अष्टावक्र गीता ॥

20 श्लोंकों का प्रथम अध्याय

जनक उवाच - कथं ज्ञानमवाप्नोति,
कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्य च कथं प्राप्तमेतद
ब्रूहि मम प्रभो॥१-१॥


वयोवृद्ध राजा जनक, बालक अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है, मुक्ति कैसे प्राप्त होती है, वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है, ये सब मुझे बताएं॥१॥

janaka uvāca
kathaṁ jñānamavāpnoti kathaṁ muktirbhaviṣyati
vairāgyaṁ ca kathaṁ prāptaṁ etad brūhi mama prabho

Janaka: How is knowledge to be acquired? How is liberation to
be attained? And how is dispassion to be reached? Tell me this, sir.
Old king Janak asks the young Ashtavakra - How knowledge is attained, how liberation is attained and how non-attachment is attained, please tell me all this.॥1॥
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अष्टावक्र उवाच ॥
अष्टावक्र उवाच -मुक्तिमिच्छसि चेत्तात्,
विषयान विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोष, सत्यं
पीयूषवद्भज ॥१-२॥

श्री अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आपमुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये। क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये॥२॥

aṣṭāvakra uvāca
muktiṁ icchasi cettāta viṣayān viṣavattyaja
kṣamārjavadayātoṣasatyaṁ pīyūṣavad bhaja

Ashtavakra: If you are seeking liberation, my son, shun the
objects of the senses like poison. Practise tolerance, sincerity,
compassion, contentment and truthfulness like nectar.

Sri Ashtavakra answers - If you wish to attain liberation, give up the passions (desires for sense objects) as poison. Practice forgiveness, simplicity, compassion, contentment and truth as nectar.॥2॥

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न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न
वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं
चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥१-३॥

आप न पृथ्वी हैं, न जल, न अग्नि, न वायु अथवा आकाश ही हैं। मुक्ति के लिए इन तत्त्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए॥३॥
na pṛthvī na jalaṁ nāgnirna vāyurdyaurna vā bhavān
eṣāṁ sākṣiṇamātmānaṁ cidrūpaṁ viddhi muktaye 1.3
You do not consist of the elements - earth, water, fire, air or even
ether. To be liberated, know yourself as consisting of
consciousness, the witness of these.
You are neither earth, nor water, nor fire, nor air or space. To liberate, know the witness of all these as conscious self.॥3॥
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यदि देहं पृथक् कृत्य
चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शान्तो
बन्धमुक्तो भविष्यसि॥१-४॥

यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे॥४॥

yadi dehaṁ pṛthak kṛtya citi viśrāmya tiṣṭhasi
adhunaiva sukhī śānto bandhamukto bhaviṣyasi
॥ अष्टावक्र गीता ॥Ashtavakra Gita
6
If only you will remain resting in consciousness, seeing yourself
as distinct from the body, then even now you will become happy,
peaceful and free from bonds. 1.4
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न त्वं विप्रादिको वर्ण:
नाश्रमी नाक्षगोचर:।
असङगोऽसि निराकारो
विश्वसाक्षी सुखी भव॥१-५॥

आप ब्राह्मण आदि सभी जातियोंअथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं। आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं, ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ

na tvaṁ viprādiko varṇo nāśramī nākṣagocaraḥ
asaṅgo'si nirākāro viśvasākṣī sukhī bhava
You do not belong to the brahmin or any other caste, you are not
at any stage, nor are you anything that the eye can see. You are
unattached and formless, the witness of everything - so be happy.
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धर्माधर्मौ सुखं दुखं
मानसानि न ते विभो।
न कर्तासि न भोक्तासि
मुक्त एवासि सर्वदा॥१-६॥

धर्म, अधर्म, सुख, दुःख मस्तिष्क सेजुड़ें हैं, सर्वव्यापक आप से नहीं। न आप करने वाले हैं और न भोगने वाले हैं, आप सदा मुक्त ही हैं
dharmādharmau sukhaṁ duḥkhaṁ mānasāni na te vibho
na kartāsi na bhoktāsi mukta evāsi sarvadā
Righteousness and unrighteousness, pleasure and pain are
purely of the mind and are no concern of yours. You are neither
the doer nor the reaper of the consequences, so you are always
free.
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एको द्रष्टासि सर्वस्य
मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बन्धो
द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥१-७॥

आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं, सदा मुक्त ही हैं, आप का बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं

eko draṣṭāsi sarvasya muktaprāyo'si sarvadā
ayameva hi te bandho draṣṭāraṁ paśyasītaram
You are the one witness of everything, and are always
completely free. The cause of your bondage is that you see the
witness as something other than this.
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अहं कर्तेत्यहंमान
महाकृष्णाहिदंशितः।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं
पीत्वा सुखं भव॥१-८॥

अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मान लेते हैं।'मैं कर्ता नहीं हूँ', इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाइये
ahaṁ kartetyahaṁmānamahākṛṣṇāhidaṁśitaḥ
nāhaṁ karteti viśvāsāmṛtaṁ pītvā sukhī bhava
Since you have been bitten by the black snake, the opinion about
yourself that "I am the doer", drink the antidote of faith in the
fact that "I am not the doer", and be happy.
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एको विशुद्धबोधोऽहं
इति निश्चयवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं
वीतशोकः सुखी भव॥१-९॥

मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ, इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें, इस प्रकार शोकरहित होकर सुखी हो जाएँ
eko viśuddhabodho'haṁ iti niścayavahninā
prajvālyājñānagahanaṁ vītaśokaḥ sukhī bhava
Burn down the forest of ignorance with the fire of the
understanding that "I am the one pure awareness", and be happy
and free from distress.
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यत्र विश्वमिदं भाति
कल्पितं रज्जुसर्पवत्।
आनंदपरमानन्दः स
बोधस्त्वं सुखं 
चर॥१-१०॥
जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे, उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें
yatra viśvamidaṁ bhāti kalpitaṁ rajjusarpavat
ānandaparamānandaḥ sa bodhastvaṁ sukhaṁ bhava
That in which all this appears - imagined like the snake in a rope,
that joy, supreme joy and awareness is what you are, so be
happy.
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मुक्ताभिमानी मुक्तो हि
बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किवदन्तीह सत्येयं
या मतिः सा गतिर्भवे
त्॥१-१
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है११
॥ अष्टावक्र गीता ॥Ashtavakra Gita
9
muktābhimānī mukto hi baddho baddhābhimānyapi
kiṁvadantīha satyeyaṁ yā matiḥ sā gatirbhavet
If one thinks of oneself as free, one is free, and if one thinks of
oneself as bound, one is bound. Here this saying is true,
"Thinking makes it so".
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त्मा साक्षी विभुः
पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असंगो निःस्पृहः शान्तो
भ्रमात्संसारवानिव॥१-१२॥

आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक,मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छारहित एवं शांत है। भ्रमवश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है१२
ātmā sākṣī vibhuḥ pūrṇa eko muktaścidakriyaḥ
asaṁgo niḥspṛhaḥ śānto bhramātsaṁsāravāniva
Your real nature is as the one perfect, free, and actionless
consciousness, the all-pervading witness - unattached to
anything, desireless and at peace. It is from illusion that you
seem to be involved in samsara.
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कूटस्थं बोधमद्वैत-
मात्मानं परिभावय।
आभासोऽहं
 भ्रमं मुक्त्वा
भावं बाह्यमथान्तरम्॥१-१३॥

अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और 'मैं' के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें१३
kūṭasthaṁ bodhamadvaitamātmānaṁ paribhāvaya
ābhāso'haṁ bhramaṁ muktvā bhāvaṁ bāhyamathāntaram
Meditate on yourself as motionless awareness, free from any
dualism, giving up the mistaken idea that you are just a
derivative consciousness, or anything external or internal.
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देहाभिमानपाशेन चिरं
बद्धोऽसि पुत्रक।
बोधोऽहं ज्ञानखंगेन 

तन्निष्कृत्य
 सुखी भव॥१-१४॥
हे पुत्र! बहुत समय से आप 'मैं शरीर हूँ' इस भाव बंधन से बंधे हैं, स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ१४
dehābhimānapāśena ciraṁ baddho'si putraka
bodho'haṁ jñānakhaṁgena taḥnikṛtya sukhī Bhava
You have long been trapped in the snare of identification with
the body. Sever it with the knife of knowledge that "I am
awareness", and be happy, my son.
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निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते
 बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥

आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है१५
niḥsaṁgo niṣkriyo'si tvaṁ svaprakāśo niraṁjanaḥ
ayameva hi te bandhaḥ samādhimanutiṣṭhati
You are really unbound and actionless, self-illuminating and
spotless already. The cause of your bondage is that you are still
resorting to stilling the mind.
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त्वया व्याप्तमिदं विश्वं
त्वयि प्रोतं यथार्थतः।
शुद्धबुद्ध
स्वरुप
स्त्वं मा
गमः क्षुद्रचित्तताम्॥१-१६॥

यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है, वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है। तुम शुद्ध और ज्ञानस्वरुप हो, छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो
tvayā vyāptamidaṁ viśvaṁ tvayi protaṁ yathārthataḥ
śuddhabuddhasvarūpastvaṁ mā gamaḥ kṣudracittatām
All of this is really filled by you and strung out in you, for what
you consist of is pure awareness - so don't be small minded.
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निरपेक्षो निर्विकारो
निर्भरः शीतलाशयः।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव
चिन्मात्रवासन:॥१-१७॥

आप इच्छारहित, विकाररहित, घन (ठोस), शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं, शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये१७
nirapekṣo nirvikāro nirbharaḥ śītalāśayaḥ
agādhabuddhirakṣubdho bhava cinmātravāsanaḥ
You are unconditioned and changeless, formless and immovable,
unfathomable awareness and unperturbable, so hold to nothing
but consciousness.
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साकारमनृतं विद्धि
निराकारं तु निश्चलं।
एतत्तत्त्वोपदेशेन
न पुनर्भवसंभव:॥१-१८॥

आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये, इस तत्त्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है१८
sākāramanṛtaṁ viddhi nirākāraṁ tu niścalam
etattattvopadeśena na punarbhavasaṁbhavaḥ

Recognise that the apparent is unreal, while the unmanifest is
abiding. Through this initiation into truth you will escape falling
into unreality again.
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यथैवादर्शमध्यस्थे
रूपेऽन्तः परितस्तु सः।
तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः
परितः परमेश्वरः॥१-१९॥

जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी, उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी१९
yathaivādarśamadhyasthe rūpe'ntaḥ paritastu saḥ
tathaivā'smin śarīre'ntaḥ paritaḥ parameśvaraḥ
Just as a mirror exists everywhere both within and apart from its
reflected images, so the Supreme Lord exists everywhere within
and apart from this body.
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एकं सर्वगतं व्योम
बहिरन्तर्यथा घटे।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म
सर्वभूतगणे तथा॥१-२०॥

जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है, उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है२०
ekaṁ sarvagataṁ vyoma bahirantaryathā ghaṭe
nityaṁ nirantaraṁ brahma sarvabhūtagaṇe tathā
Just as one and the same all-pervading space exists within and
without a jar, so the eternal, everlasting God exists in the totality
of things.

Monday, October 31, 2016

त्यागने और छोड़ने को क्या है?

जो खोने और त्यागने योग्य हैं तो वो है कल्पनाएॅं.
जो कुछ भी यथार्थ है वह कभी भी हमारे जागने में बाधक नहीं बनता.
यह सारी काल्पनिक.सोची.विचारी चीजें ही हैं
जो हमें सोये रखने में सहायक होती हैं..और
हमें बस इन्हें ही छोड़ देना है।
पी डी ओस्पेंस्की
What one has to lose is imagination. Anything that is real is not an obstacle to awakening. It is the imaginary things that keep us asleep, and those we have to give up."
P. D. Ouspensky


Wednesday, June 17, 2015

अनेक रोगों की घरेलू औषधि है पान

पान भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत विभिन्न संस्कारों में हवन, यज्ञ, पूजन, देवार्पण आदि में पान की अनिवार्यता स्वीकारी गयी है। पान सत्कार का भी एक ऐसा सस्ता, सरल और उत्तम साधन है जो समाज में छोटे-बड़े, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब सभी को समानता और सम्मान की एकरूपता प्रदान करता है जो भारतीय पुरातन सांस्कृतिक समाजवाद का एक रूप है। आयुर्वेद में पान का अत्यधिक महत्व है। औषधि के रूप में पान का प्रयोग प्राचीन काल से ही होता आ रहा है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में पान का औषधि के रूप में प्रचुर उल्लेख मिलता है। पान स्वयं में एक औषधि है। इसके साथ ही कई प्रकार की औषधियों में भी पान का उपयोग होता है। पान को तम्बूल, नागबेल, नोगरबेल, बीटल लीप आदि के नामों से भी जाना जाता है। औषधीय कर प्रयोग के रूप में पान का निम्नानुसार प्रयोग किया जाता है।
* पान के रस को शहद के साथ चटाने के बच्चों की सूखी खांसी ठीक हो जाती है।
* पान के पत्तों का रस आंखों में डालने से रतौंधी की बीमारी में लाभ होता है।
* बच्चों की छाती में कफ भर गया हो तो पान पर अरंड (अंडी) का तेल लगाकर थोड़ा गरम करके छाती पर बांधते रहने से कफ निकल जाता है।
* बच्चों को अजीर्ण होने पर पान के रस में थोड़ा-सा शहद मिलकार चटायें। इससे अपान वायु निकल जाती है।
* सूखी खांसी एवं कुकुर खांसी में पान के रस से लाभ होता है। खांसी हेतु होने पर पान के रस को निकालकर थोड़ा गर्म करके दिन में तीन-चार बार तक पिलाते रहना चाहिए।
* सूखी खांसी में वच, अजवाइन और छोटी पीपल पान में रखकर रस चूसने खांसी ठीक हो जाती है।
* मिट्टी के तेल आदि की गंध हाथ में लग जाये तो पान के पत्ते को मल लेने से उसकी गंध निकल जाती है।
* कंठ में कफ भर जाने पर पान का रस, काली मिर्च का चूर्ण एवं शहद मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें। शीतजन्य स्वर भंग होने पर पान के बीड़े में मुलहठी का चूर्ण डालकर सेवन करने से लाभ होता है।
* गांजा, भांग, अफीम और मदिरा के नशे को दूर करने के लिए पान के पत्तों के रस को छाछ के साथ मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
* पान के रस में दुगुनी शक्कर मिला कर सेवन करने से हृदय की दुर्बलता दूर होती है तथा इससे पाचन शक्ति भी बढ़ती है।

Tuesday, December 9, 2014

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष. यानि यदि आप इंसान के रूप में पैदा हुए हैं तो सबसे पहले यह जानना जरूरी था कि धर्म क्या है, इसके बाद जीवन में सार्थक क्या है यह जानना दूसरी प्राथमिकता थी, तीसरी थी — कामनाओं का स्वरूप जानना और चौथी और आखिरी चीज जो इन तीनों के बाद स्वयं आती थी (वैसे ही जैसे पेड़ से फल पक कर गिर जाता है यानि मोक्ष) ...
धर्म का मतलब किसी मनुष्य से दिखने वाले रोबोट में गीता, कुरान, बाइबिल जैसी किताबों के साफ्टवेयर इंस्टाल कर के हिंदू मुसलमान या ईसाई हो जाना नहीं होता। धर्म का मतलब है अपने तन मन रूह, अपने अस्तित्व की प्रकृति से अवगत होना।
अर्थ का मतलब...धन दौलत कमाने में ही जीवन की सार्थकता से नहीं.. बल्कि जीवन में क्या क्या अर्थवान है इसकी खोज है।
काम का अर्थ बच्चे पैदा करना नहीं होता।
काम का अर्थ है कामनाओं की समझ होना, इच्छा का स्वरूप पता होना, इंद्रियों के संसर्ग से इच्छा कैसे पैदा होती है और मन में अहं सी कुण्डली मारकर कैसे बैठ जाती है... इच्छा अपने होने को ही जीवन कैसे कहती है, इसकी खोज खबर रखना काम को जानना है।
मोक्ष का मतलब देह का विसर्जन सीखना, त्याग सीखना नहीं है। मोक्ष का मतलब आत्महत्या करना नहीं है। मोक्ष का मतलब जीवन मरण से मुक्ति नहीं है।
मोक्ष का अर्थ है जो मुक्त ही है उसे जान लेना, खुद से परिचित हो जाना....

Wednesday, January 22, 2014

ब्राम्ह्ण तीनों गुणों से परे होता है.



सत्, रज और तमस... इन तीनों गुणों में से किसी की भी पहुँच सत्य तक नहीं होती; ये तो डाकू-लुटेरों की तरह होते हैं, जो पकड़े जाने के डर से सार्वजनिक जगहों पर नहीं आते. 

एक बार एक आदमी जंगल से गुजर रहा था कि तीन डाकू अचानक प्रकट हुए और उन्होंने उस व्यक्ति के पास जो कुछ भी था सब लूट लिया। तब उनमें से एक डाकू बोला - इस आदमी को जिंदा छोड़ देने का क्या मतलब है? ऐसा कहते हुए वो डाकू अपनी कटार लेकर आदमी को मारने को उद्धत हुआ, तो दूसरा डाकू बाला- इसे मारकर भी हमें क्या मिल जायेगा? उस दूसरे डाकू ने आदमी को हाथ-पैर बाँधकर वहीं जंगल में छोड़ दिया। डाकू आगे बढ़ गये।

कुछ देर बाद ही तीसरा डाकू उस हाथ-पैर बंधे व्यक्ति के पास लौटा और बोला - ओह्, मुझे माफ करना। आप घायल हो? मैं आपको बंधनो से आजाद करता हूं। उसके हाथ-पैर खोलने के बाद वो डाकू बोला - मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें जंगल से बाहर, मुख्य मार्ग तक पहुंचा देता हूं। काफी देर बाद वह मुख्य सड़क तक पहुंचे। डाकू बोला- अब ठीक है, तुम इस सड़क पर सीधे चलते चले जाना, तो तुम अपने घर तक पहुंच जाओगे।
तब वह व्यक्ति बोला- आप तो मेरे लिए बहुत अच्छे रहे हैं, आपने मेरा बड़ा भला किया है, आप मेरे साथ मेर घर क्यों नहीं चलते। डाकू बोला-  नहीं, मैं वहां नहीं जा सकता। पुलिस मेरे बारे मे ंसब जानती है।

यह संसार भी एक जंगल की तरह है। जो तीन डाकू-लुटेरे यहाँ आपकी फिराक में हैं वो हैं सत्व, रजस और तमस। जो व्यक्ति यहां लुटा वो सत्य का ज्ञान है। तमस ज्ञान को नष्ट कर देना चाहता है। रजस मनुष्य को संसार से बाँधता है, पर सत्व होता है जो उसे तमस और रजस से मुक्त करता है। सत्व के संरक्षण में ही मनुष्य, क्रोध, भावावेश और तमस की अन्य शैतानी प्रवृत्तियों से बच पाता है। हालांकि सत्व हमें सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है तो भी वो है एक डाकू ही। सत्व मनुष्य को अंतिम सत्य का ज्ञान नहीं कराता तो भी वह मनुष्य को वह मार्ग दिखाता है जो ईश्वर तक ले जाये। वह मनुष्य को उस मार्ग तक ले जाता है जहां जाकर वह कहता है - यह है वो  मार्ग जिसके किसी सिरे पर तुम्हारा घर है। हालांकि सत्य भी ब्रम्हज्ञान से बहुत दूर होता है।

Friday, March 29, 2013

ईश्वर की छवि और ईश्वर का सच

ईश्वर इंसान जैसा कोई चरित्र नहीं हैं..ये अलग बात है कि वो ऐसा हो भी स​कता है और नहीं भी। ईश्वर को आपके जीने—मरने से कोई सरोकार भी नहीं होता, ये और बात है कि आप कुदरत के नियमों को जानते समझतें हैं... उसके हिसाब से चलते हैं तो आपकी उम्र काफी लंबी हो। 
ईश्वर को जानने वाले कभी यह नहीं कहते कि वो ईश्वर के प्रतिनिधि हो गये हैं और उन्हें कुछ खास तरह के अधिकार बख्शे गये हैं..ये अलग बात है कि उनके बारे में हमारी कुछ धारणाओं में ऐसा पाया जाता है. किसी देवी को जीभ काट कर चढ़ा देना, किसी सदमें से ना उबर पाने की पिनक में सन्यासी बन कर जिन्दगी भर भटकते रहना, ईश्वर के बारे में सोचते हुए पागल हो जाना, ईश्वर के नाम पर भीख मांगना और धनदौलत का साम्राज्य खड़ा करना...इन सब बातों का ईश्वर से कैसा रिश्ता हो सकता है?

बाबा बनकर भीड़ की साष्टांग दंडवतों के मज़े लेना, भीड़ को भेड़—बकरियों की तरह चराना..इससे किसी ईश्वर को क्या लेना देना। आप कौन सी भाषा बोल रहे हैं, किस ग्रह के और किस देश संस्कृति  में पले बढ़े हैं इस के हिसाब से आपके आराध्य तय होते हैं... ना कि एक ओरिजनल ईश्वर. 
आपकी इच्छाओं आकांक्षाओं और फिर असफलताओं और कुदरती आपदाओं से ईश्वर के क्या सरोकार हो सकते हैं? या बचपन, जवानी, बुढ़ापे में बंटी 100 बरसे की छोटी सी जिंदगी की उपलब्धियों अनुपलब्धियों से ... (आपके हिसाब से भी) सृष्टि चलाने वाले ईश्वर के क्या रिश्ता है.